आर्थिक नीतियों की मनमोहनी विफलता
(प्रभात कमार रॉय)
विस्फोटक खबर आई कि जनवरी-मार्च 2012 की तिमाही के दौरान भारत की विकास दर (जीडीपी)
लुढ़क कर महज 5.3 प्रतिशत पर पंहुच गई है, जोकि विगत नौ वर्षो के सबसे निम्न स्तर
पर है। दिसंबर 2004 में जीडीपी की दर 5.5 प्रतिशत रही थी। राष्ट्र के वर्तमान
आर्थिक संकट की तुलना 1991 के अर्थ सकंट से की जा रही है । जिस
जीडीपी के 11 फीसदी तक की ऊंचाई को छू सकने का शासकीय दावा बड़े जोर शोर से पेश
किया जा रहा था, आखिरकार
किस तरह जीडीपी इस कदर शिथिल और पस्त हो गई कि समूचा राष्ट्र चिंतित हो उठा है।
दरअसल भारत की सरकार के प्रधानमंत्री के तौर पर कयादत करने वाले अत्यंत काबिल कहे
जाने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री काल की दूसरी पारी में बुरी तरह विफल राजनेता
सिद्ध हो चुके हैं। भारतीय अर्थ व्यवस्था की वर्तमान दुर्दशा को दरअसल एक गंभीर
राजनीतिक विफलता भी क़रार दिया जाना चाहिए। तकरीबन 19 लाख करोड़ के विराट शासकीय
आर्थिक घोटालों ने भी अर्थव्यवस्था को गहन संकट में डालने में अहम किरदार निभाया
है। प्रधानमंत्री की आर्थिक-राजनीतिक नीतियों की घनघोर विफलता ने यूरोप और अमेरिका
की तर्ज पर भारत को आर्थिक मंदी के दुशचक्र में फंसा दिया है। सन् 2008 की विगत
आर्थिक मंदी से तो भारत किसी तरह निजी क्षेत्र को अरबों-खरबों रुपयों का पैकेज
प्रदान करके से बच निकला था, किंतु इस बार अपना दामन आर्थिक मंदी की विध्वंसकारी
ज्वाला से कदाचित नहीं बचा सका।
आर्थिक विकास की खातिर कॉरपोरेट परस्त पूंजीवाद का जो रास्ता प्रधानमंत्री मनमोहन
सिंह की कयादत में अख्तियार किया गया, उसका स्वाभाविक परिणाम है, वर्तमान दौर की
विनाशकारी आर्थिक मंदी। भारत की जिन आँखों में आर्थिक विकास की शानदार चमक दिखाई दे
रही थी, आज उन्ही दृगों में निराशा के अश्रु नजर आने लगे हैं। भारत को आर्थिक विकास
का संतुलित मध्य मार्ग अख्तियार करना चाहिए था, किंतु इसके ठीक विपरीत कॉरपोरेट
पूंजीवादी विकास की अतिवादी दुष्कर राह अपनाई गई। औद्योगिक विकास के लिए भारत की
वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के अनुरुप मंझोले और छोटे उद्योगों को प्राथमिकता
प्रदान करने के स्थान पर शासकीय नीतियों में कॉरपोरेट पूँजीवाद को ताकतवर तरजीह अता
की गई। उल्लेखनीय है कि विगत एक दशक के दौरान दस लाख से अधिक छोटे उद्योग धंधे नष्ट
हो गए। आधिकारिक तौर पर इस आर्थिक अवधारणा को पुष्ट करने का निरंतर प्रयास किया गया
कि जब कॉरपोरेट सैक्टर अत्यंत ताकतवर हो उठेगा तो उसकी समृद्धि धारा
स्वतः ही नीचे की ओर प्रवाहित होने लगेगी और भारत के गरीब तबकों को विशेष आर्थिक
लाभ पंहुचाएगी।
मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का दुशःपरिणाम भारत के समक्ष आ गया, जिसके तहत
राष्ट्र के विहंगम आर्थिक पटल पर अरबपतियों और खरबपतियों की तादाद तेजी के साथ
बढ़ती रही, किंतु गरीबी की रेखा के नीचे किसी तरह से जिंदा बने रहने वाले
भारतवासियों की संख्या भी चालीस करोड़ को पार कर गई। रोजगार विहीन ऊंची आर्थिक
विकास दर ने भारत में बेरोजगार नौजवानों की तादाद को 15 करोड़ तक पंहुचा दिया। 1992
से 1998 तक बेरोजगारी की दर 5.99 प्रतिशत थी, जोकि 2010 में छगांल भरकर 10.8
प्रतिशत हो गई। मनमोहन सरकार की कॉपोरेटर परस्त नीतियों ने भारत की उच्च बचत दर
38.8 प्रतिशत को खतरनाक तौर पर 21.5 तक कम कर दिखाया। गैर जरुरी शान-ओ-शौकत
प्रदर्शित करने वाले खर्चो में जबरदस्त इज़ाफ़ा अंजाम दिया गया।
कॉरपोरेट पूँजीवाद के तहत आर्थिक विकास की अहम विशिष्टता रही है कि वह सदैव
असंतुलित
आर्थिक विकास को अंजाम देता रहा है। केवल आर्थिक विकास दर की गंभीर गिरावट का कटु
तथ्य ही भारत को असहज नहीं कर रहा है, वरन् विनिर्माण क्षेत्र में भी गंभीर गिरावट
दर्ज की जा चुकी है। विनिर्माण क्षेत्र जोकि 8.2 प्रतिशत दर का आंकड़ा छू रहा था
लुढ़क कर 2.8 प्रतिशत की दर पर आ चुका है। देश की औद्योगिक विकास दर का आंकड़ा 0.3
प्रतिशत के रसातल बिंदु तक जा पंहुचा है। मनमोहन सिंह की कॉरपोरेट परस्त आर्थिक
नीतियों के कारण कृषि विकास दर का प्रतिशत तो पहले से ही 1.7 पर सिमट चुका है। भारत
की कृषि और किसानों पर तो विगत दो दशकों से कोई तव्वजो प्रदान नहीं की गई। 25 लाख
करोड़ अनाज का रिकार्ड उत्पादन अंजाम देने वाला किसान शासकीय नीतियों में कितना
अधिक उपेक्षित रहा है, यह तो किसानों के दारुण आत्मघात के आँकड़े खुद-ब-खुद बयान
करते हैं। किसानों के लिए कथित हरित क्रांति के फायदे तो कभी के तिरोहित हो चुके
हैं। तकरीबन 11 करोड़ लोग भूमिहीन मजदूरों के तौर पर खेतीबाड़ी से संलग्न हैं। 80
करोड़ किसानों में तकरीबन 70 फीसदी किसानों के पास एक हैक्टेयर से कम जमीन मौजूद
है। छोटे उद्योगों और कृषि क्षेत्र पर समुचित ध्यान न देने का कुपरिणाम रहा कि देश
आज आर्थिक मंदी के चक्र में फँस गया है। अन्यथा
भारत का
छोटा औद्यौगिक क्षेत्र और कृषि क्षेत्र सक्षम होकर किसी भी आर्थिक संकट से निपट
सकता है।
सार्वजिनिक क्षेत्र की यूनिटों की घनघोर शासकीय उपेक्षा अंजाम दी गई और उसकी
लाभकारी यूनिटों का विनिवेश करने की नीति को बाकायदा जारी रखा गया। कथित आर्थिक
सुधारों के नाम पर सार्वजिनिक क्षेत्र को निरंतर कमजोर करने और इसके शक्तिशाली
इंफ्रास्ट्रचर के दमखम पर निजी कॉरपोरेट सैक्टर को फायदा पंहुचाने की नीति पर अमल
दरामद किया गया। भारत को टैलिक़ॉम सैक्टर इसका सबसे अहम उदारण बन गया है, जहाँ कि
2जी स्पैक्ट्रम स्कैम सरीखा विराट घोटाला मनमोहनी हुकूमत के तहत घटित हुआ। अब तक
उजागर हुए 11 लाख करोड़ रुपयों के कोयला स्कैंडल के बदनुमा दाग़ खुद प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह के शफ्फाक़ दामन पर नज़र आने लगे हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अमेरिका के प्रति विकट प्रेम किसी से लुका-छुपा नहीं
रहा है। प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने विगत यूपीए1 हुकूमत को तो अमेरिका
से न्यूक्लियर डील के सवाल पर दाँव पर लगा दिया था। अमेरिका के तर्ज-ओ-तरीकों पर
भारत के आर्थिक विकास को दिशा देने की धुन में मनमोहन सिंह ने भारत की वस्तुगत
हालात और हकीक़त को विस्मृत कर दिया कि भारत को रोजगार उन्मुख
आर्थिक विकास की प्रबल दरक़ार है। देश की आबादी 121 करोड़ है और सबसे पहले इसका पेट
भरना है और इसकी बुनियादी जरुरतों को पूरा करना है। राष्ट्र को ऐसा कथित आर्थिक
विकास कदापि नहीं चाहिए, जिसके तहत देश के कुछ मुठ्ठीभर खानदान अमीर से अमीरतर होते
चले जाए और सौ करोड़ मेहनतकश किसान-मजदूर बेबस और कंगाल बने रहे। देश के जनमानस की
लूट से उपजी अकूत काली दौलत से विदेशी बैंक तो सरसब्ज बने रहे और राष्ट्र का राजकोष
कंगाल हो जाए। आर्थिक समता की ओर उन्मुख आर्थिक नीतियों को नहीं अपनाकर और कॉरपोरेट
परस्त पूँजीवादी नीतियों का अनुगमन करने से राष्ट्र को अप्रतिम नुकसान हुआ है।
(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)