नाकाम रही यूपीए2 हुकूमत

(प्रभात कुमार रॉय)

भव्य सरकारी जश्न के साथ यूपीए2 हुकूमत के शासनकाल का तृतीय वर्ष 22 मई 2012 को समाप्त हो गया। सरकारी जश्न को डीएमके लीडर एम. करुणानिधि और तृणमूल कांग्रेस लीडर ममता बनर्जी ने शिरक़त नहीं की। सरकारी जश्न  में समाजवादी लीडर मुलायम सिंह और लालू यादव मंचासीन हुए। वर्षो के सत्ताकाल के दौरान यूपीए2 हुकूमत की क़यादत करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक तेजस्वी, कारगर और कामयाब अर्थशास्त्री राजनेता के तौर पर 1991 से अर्जित अपने यशस्वी चरित्र को कलंकित कर लिया। यूपीए2 हुकूमत के शासनकाल में एक कठपुतली प्रधानमंत्री का क़िरदार निभाते हुए, मनमोहन सिंह वस्तुतः अपने जीवन की सबसे खराब पारी खेल रहे हैं।  23 मई को पैट्रोल के दाम में सात रुपए पचास पैसे प्रति लीटर का भारी इज़ाफा अंजाम दिया गया। भारतीय जनमानस निरंतर कमरतोड़ मंहगाई के बोझ तले कराहता रहा और चीखता रहा, किंतु उसकी दर्दभरी चीखों और आर्तनाद को यूपीए2 हुकूमत के शीर्षस्थ लीडर निष्ठुर रुप से अनसुना करते रहे। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं विशेषकर खाद्य सामग्री के दामों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि दर दर्ज की गई। शासनकाल के शुरुआती दौर में तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह केवल सौ दिनों में मंहगाई पर काबू पा लेने का आश्वासन राष्ट्र को देते नजर आए। बाद में तो भस्मासुर मंहगाई के ज्वलंत प्रश्न पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रहस्यमयी चुप्पी साध ली। खाद्य सामग्री जब तक किसानों के पास होती हैं तो उसके दाम कौड़ियों के भाव रहते हैं और जब बिचौलियों, दलालों और जमाखोरों के कब्जे में जा पंहुचती है तो फिर दाम आसमान छूने लगते हैं। विगत कुछ माह पूर्व आलू के उत्पादन का ही उदाहरण ले, किसानों के पास जब तक आलू रहा तो उसका भाव मिट्टी के मोल भी नहीं था और अब उसी आलू में मंहगाई की आग लगी है। तकरीबन यही हाल किसानों द्वारा उत्पादित प्रत्येक वस्तु का है। यूपीए2 हुकूमत के दौरान किसानों के हालात बद से बदतर होते चले गए। राष्ट्र को लाइसेंस राज से मुक्ति दिला कर आर्थिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त करने वाले अर्थशास्त्री राजनेता मनमोहन सिंह राष्ट्र के किसानों की तरक्की के लिए कोई राह हमवार नहीं कर सके। राष्ट्र के करोड़ों किसान गुरबत और कर्जों से अभिशप्त और त्रस्त रहे। देश के लाखों किसान आत्मघात के लिए विवश रहे। अनाज का रिकार्ड उत्पादन करने वाले राष्ट्र के तकरीबन 30 करोड़ बदनसीब नागरिक भूखे पेट रहे। अमीरों को साढे पाँच लाख करोड़ की टैक्स माफी प्रदान करने वाली हुकूमत गरीबों को दी जाने वाली सबसिडी का खात्मा करके अपना वित्तीय घाटा कम करने पर आमादा है। इन कटु तथ्यों को हुकूमत की जबरदस्त नाक़ामी क़रार न दिया जाए तो फिर और क्या कहा जाए ?

अत्यंत ईमानदार राजनेता की विलक्ष्ण और अक्षुण प्रतिष्ठा रखने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कयादत में यूपीए2 हुकूमत ने विगत तीन वर्षो के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के विश्व रिकार्ड कायम कर दिखाए। एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टूजी स्पैक्ट्रम स्कैंडल से शासकीय स्कैंडल्स की दास्तान प्रारम्भ होकर ग्यारह लाख करोड़ के कोयला स्कैंडल तक का बेहद बदनाम सफर तय कर चुकी है। जिसके एक पड़ाव में सत्तर हजार करोड़ का कामन वैल्थ गेम्स स्कैंडल भी शामिल है, जिसने समूची दुनिया में भारत को रुसवा और बदनाम किया। सुप्रीमकोर्ट की सराहनीय और शानदार पहल पर टूजी स्पैक्ट्रम स्कैंडल के अभियुक्तों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। सुप्रीमकोर्ट ने अन्य स्कैंडल्स का भी संजीदा संज्ञान लिया। शासकीय स्कैंडल्स के अभियुक्तों के बरखिलाफ कारगर कदम उठाने में मनमोहन सिंह की यूपीए2 हुकूमत पूर्णतः विफल रही। कमजोर और प्रभावहीन प्रधानमंत्री की दुर्भाग्यपूर्ण छवि निर्मित कर चुके मनमोहन सिंह ने यूपीए1 हुकूमत के तहत कुछ उम्मीदें अवश्य जगाई थी। मनमोहन सिंह ने साहसपूर्वक अमेरिका से न्यूक्लियर डील के प्रश्न पर अपनी हुकूमत को दांव पर लगा दिया था। सन् 2009 के आमचुनाव में राष्ट्रीय काँग्रेस ने अपनी सीटें 145 से बढ़ाकर 206 के आंकड़े पर पंहुचा दी। वस्तुतः 2009 में राजसत्ता में प्रतिष्ठित हुई यूपीए2 हुकूमत ने जन-गण की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। विगत वर्ष से भ्रष्ट्राचार पर लगाम कसने के लिए अत्यंत सशक्त लोकपाल बिल संसद में पास कराने के प्रबल प्रश्न पर जिस कोटि की कपटपूर्ण दग़ाबाजी यूपीए2 हुकूमत ने अंजाम दी है, उसकी मिसाल नहीं दी जा सकती। यूपीए2 हुकूमत जो खुद ही सबसे बड़े शासकीय भ्रष्टाचार से सराबोर स्कैंडल्स की सृजक रही है, भला उससे और क्या अपेक्षा और उम्मीद की जा सकती थी। भ्रष्टाचार से सराबोर यूपीए2 हुकूमत ने लाखों करोड़ों की अकूत काली दौलत के ज्वलंत राष्ट्रीय प्रश्न पर 97 पृष्ठों का श्वेतपत्र जारी किया, किंतु अपार काली दौलत को राष्ट्रीय राजकोष में वापस लाने के लिए किसी कारगर कदम का ऐलान करने की जहमत नहीं उठाई। प्रत्येक ज्वलंत राष्ट्रीय प्रश्न पर धृष्टतापूर्ण लीपापोती करने यूपीए2 की रवायत को बाकायदा जारी रखा गया।

यूपीए2 हुकूमत ने शिक्षा को संवैधानिक तौर पर मौलिक अधिकार अवश्य बनाया और बहुत वाहवाही लूटी। वस्तुतः यूपीए2 हुकूमत ने वास्तविक जमीनी स्तर पर भारत माता के करोड़ों बच्चों की मुक्ति लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। राष्ट्र के करोड़ों बच्चे आज भी स्कूली शिक्षा-दीक्षा से वंचित बने रहे और बाल मजदूरों के तौर पर गुलामी करने पर मजबूर रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र को प्राइवेट सैक्टर के रहम-ओ-करम के हवाले करके हुकूमत ने अपने मौलिक कर्तव्य की इतिश्री कर ली। शिक्षा के मौलिक अधिकार तशकील हो जाने के बावजूद आज भी सड़क किनारे ढ़ाबों में, मोटर गैराजों में, घरों में, दुकानों में, छोटे कारखानों में खुले आम बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। आखिरकार यह कैसा मौलिक अधिकार निर्मित हुआ है, जिसके करम से करोड़ों बच्चे महरुम हैं और यूपीए-2 हुकूमत का शासनतंत्र निष्क्रिय है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के अहम प्रश्न पर यूपीए2 हुकूमत किसी भी तौर पर सुसंगत नीति का निर्माण करने में विफल सिद्ध हुई। जेहादी आतंकवाद और नक्सलवाद का आक्रमक रुख बरक़रार है। राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन पर लगभग एक दर्जन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के कड़े एतराज के चलते आखिर केंद्र सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और कहना पड़ा कि जब तक केंद्र और राज्यों के बीच सहमति नहीं बनेगी तब तक उस पर अमल स्थगित रखा जाएगा। एनसीटीसी के गठन के प्रश्न पर यूपीए2 हुकूमत ने व्यवहारिक रुख अख्तियार करने के स्थान पर गहन हठधर्मीता का इज़हार किया। एनसीटीसी को दरअसल आतंकवाद पर नीति निर्धारण केंद्र को तौर पर गठित किया जाना चाहिए, जबकि आतंकवाद पर नाक़ाम साबित हुए गृहमंत्री चिदंबरम ने एक कार्यकारी (एक्जीक्यूटिव) केंद्र के तौर पर एनसीटीसी को गठित करने की ठानी। आतंकवाद के जटिल प्रश्न पर हुकूमत ने सदैव अधकचरी नीतियों पर अमल किया। परिणाम सामने है कि नक्सलों ने अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्मयकारी विस्तार अंजाम दिया और ज़ेहादी आतंकवाद के हौंसले पस्त नहीं किए जा सके। यूपीए2 हुकूमत प्रभावहीन तौर से ऐसे ही डगमगाते हुए चलते रहेगी ममता यदि अपनी बैसाखियां खींच लेगी तो फिर मुलायम सिंह सरकार बचा लेगें। पॉलिसी पैरालैसिस से ग्रस्त नाक़ाम हुकूमत का और क्या मुस्तक़बिल हो सकता है ?

(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)