उत्तर बनाम दक्षिण भारत की प्रगति

(प्रभात कुमार रॉय)

भारतवर्ष एक विहंगम और विराट राष्ट्र रहा है, जिसे कि मुख्यतः उत्तर, दक्षिण पूरब, पश्चिम इलाकों के परिपेक्ष्य में देखा समझा जा सकता है। भारत अपने आत्मिक, नैतिक और भौतिक मर्म में अनेक धर्म- मजहब, भाषाओं, बोलियों, जातियों, संप्रदायों, कबीलों, प्रांतों की महान् इंद्रधनुषी छटा समाहित किए हुए है। भारत विश्व की प्राचीनतम सभ्यता-संस्कृति के रुप-रंग और लावण्य में अनुपम सुंगध की बयार से संपूर्ण विश्व को सुवासित करता रहा है। जंग-ए-आज़ादी के दौर अनेकता में एकता का क्रांतिकारी स्वर बुलंद करते हुए राष्ट्र ने ऐतिहासिक एकजुटता की मिसाल पेश की और साम्रज्यवादी आधिपत्य से जोरदार  मुकाबला किया। 65 वर्षो की आजादी के दौर में अनेक प्रकार की कलुषित संकीर्णताओं ने बार बार अपना सिर उठाया, किंतु भारत की एकता और अखंडता को अपूरणीय क्षति कदाचित नहीं पहुंचा सके। महान् हिमालय पर्वत की तराईयों में गंगा के तट पर बसा हुआ उत्तर भारत और दक्षिणी पठार के पेनिनसुला पर विराज रहा दक्षिणी भारत वस्तुतः  राष्ट्र की विहंगम एकता में अनेकता की विरल छवि की शानदार मिसाल है।

 

देश में आजकल जहाँ कहीं भी जाइए, वहां आर्थिक विकास और प्रगति की और रोजगार की जोरदार चर्चा होती रहती है। ऐसी विकट आर्थिक स्पर्धा का वातावरण निर्मित होना किसी राष्ट्र के लिए यह शुभ लक्षण प्रतीत हो सकता है, यदि यह धन लोलुपता से सराबोर निपट अंधी दौड़ न बन जाए। राष्ट्र की आर्थिक-भौतिक प्रगति के लिए द्वंदात्मक प्रतिस्पर्धा और अंधी होड़ के साथ ही साथ आत्मिक और नैतिक शक्तियों का निरंतर कमजोर होते हुए चले जाना यक़ीनन शुभ लक्षण क़रार नहीं दिया जा सकता। एक तरफ अमीर वर्गों के लिए जन्नत सरीखी भौतिक सुख सुविधाओं का सृजन होते जाना और दूसरी तरफ करोड़ों मेहनतकश गरीबों के लिए दोज़ख जैसे हालात का कायम बने रहना, क्या भारतवर्ष  के अमन-चैन के लिए घातक सिद्ध नहीं हो रहा है ?

 

दक्षिण भारत की यात्रा पर जब कभी भी मैं आता हूं तो यह प्रश्न मेरे मन में सदैव कौंधता रहता है कि आखिर ऐसी कौन सी विलक्षण खूबियां रही है कि आमतौर पर प्रत्येक क्षेत्र में दक्षिण भारत ने उत्तर भारत से कहीं अधिक आगे बढ़कर अपनी तरक्की दर्ज कराई है। शनैः शनैः देश के विहंगम पटल पर मजहबीं-धार्मिक, सांप्रदायिक, भाषाई और प्रांतीय विवादों का कलुष दौर कमजोर पड़ रहा है। भारत के दक्षिण के मुख्यतः चार प्रांतों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल के नागरिकों ने संकीर्ण दायरों से उपर उठकर आर्थिक विकास और प्रगति के नए सोपान लिख डाले हैं। ऐसा कदापि नहीं है कि इन सभी दक्षिण भारतीय प्रांतों में संकीर्ण सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों ने अपनी हार पूरी तरह स्वीकर कर ली है, किंतु यक़ीनन ये शक्तियां अब पहले की तरह अधिक प्रबल नहीं रह गई हैं। आर्थिक विकास का समुचित फायदा बाकायदा सभी वंचित वर्गो और समूहों तक नहीं पंहुच पाने के कारणवश संकीर्ण राष्ट्र विरोधी संकीर्ण ताकतों का पूर्ण पराभव संभव नहीं हो पा रहा है।

 

एक ऐतिहासिक दौर था, जबकि शिक्षा के क्षेत्र में आश्चर्यजनक तौर पर प्रगति करने के लिए दक्षिण भारत के केरल प्रांत  का प्रायः उल्लेख किया जाता था। 70 के दशक में ही केरल के 90 फीसदी नागरिक साक्षर हो चुके थे, अब तो यह आँकड़ा शत प्रतिशत साक्षरता दर प्राप्त कर लेने का है। उत्तर भारत के सबसे विशाल प्रांत उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो अभी तक उत्तर प्रदेश के आधे से अधिक नागरिक गण निरक्षर भट्ट हैं। औद्योगिक प्रगति की बात करें तो दक्षिणी भारत राष्ट्र में सदैव ही सबसे अग्रणी बना रहा । नवउदारवाद के आर्थिक दौर में उभर कर सामने आई इनफॉरमेशन टैकनालॉजी के क्षेत्र में दक्षिण का कर्नाटक प्रांत सबसे आगे निकल गया है। भारत की वास्तविक प्रगति के लिए अति आवश्यक मुहिम जनसंख्या नियंत्रण के मामले में तमिलनाडु ने सबसे आगे कदम बढाए हैं। अब तो शिक्षा के क्षेत्र में भी तमिलनाडु प्रांत ने भी केरल का सशक्त मुकाबला करते हुए असाधारण कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए हैं। साक्षरता क्षेत्र में तमिलनाडु शत प्रतिशत कामयाबी के निकट है। देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के क्षेत्र में भी तमिलनाडु ने राष्ट्र के पटल पर अपना अग्रणी मक़ाम दर्ज करा लिया है। तमिलनाडु में आमतौर पर हिंदी भाषा और उत्तर भारत का विरोध काफी कमजोर हो चला है और लाखों विद्यार्थी बाकायदा हिंदी का ज्ञान हासिल कर रहे हैं।

 

ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि जहाँ राज्य अपने नागरिकों को अधिक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है और संगीन अपराधों का ग्राफ काफी नीचे है, वहां पर आर्थिक विकास के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश की संभावनाएं प्रबल तौर पर बढ़ जाती है। 1991 से भारत में ग्लोबिलाइजेशन के नवउदारवादी दौर का आग़ाज हुआ तो दक्षिण के प्रांतों में पूंजी निवेश अत्यंत तेजी के साथ हुआ। परिणामस्वरुप कर्नाटक का बंगलुरु और मैसूर, आंध्र प्रदेश का हैदराबाद , केरल का त्रिवेंद्रम, तमिलनाडु का चैन्नई अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश के प्रमुख केंद्र बन गए। उत्तर भारत के नौएडा और गुंड़गाँव और चंडीगढ़ के अतिरिक्त अन्य कोई शहर विशेष रुप से पूंजी निवेश को आकर्षित नहीं कर सका।

 

वस्तुतः दक्षिण भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति अंजाम दी, जबकि उत्तर भारत शिक्षा क्षेत्र में आमतौर पर पिछड़ गया। मूलतः इसी कारण उत्तर भारत के मुख्यतः चार प्रांत बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश दुर्भाग्यपूर्ण रुप से बिमारु प्रदेश कहे जाने लगे। इन प्रदेशों में जनसख्यां में तो तेजी के साथ वद्धि हुई, किंतु विकास के अन्य क्षेत्रों में  क्रमशः ये प्रदेश पिछड़ते चले गए। उत्तर भारत में पंजाब और हरियाणा ने कृषि और आद्योगिक क्षेत्र के विकास में किसी हद तक दक्षिण भारत की आर्थिक प्रगति से टक्कर लेने की कुव्वत का प्रर्दशन अंजाम दिया। विगत कुछ वर्षो के दौरान बिहार प्रांत में आर्थिक विकास को लेकर उम्मीद की किरणें फूट पड़ी हैं।

 

 उत्तर भारत अनेक मामलों में दक्षिण भारत से संजीदा सबक हासिल कर सकता है। सबसे पहले शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में उत्तर भारत के प्रांतों को दक्षिण की तर्ज पर प्रवीणता प्राप्त करनी होगी। शिक्षा-दीक्षा में प्रवीणता के साथ ही चौतरफा आर्थिक विकास गाथा का आग़ाज मुमकिन हो सकेगा। शिक्षित-दीक्षित हेकर जनसंख्या नियंत्रण के मामले में जो मिसाल दक्षिण के प्रांतों ने राष्ट्र के समक्ष पेश कर दी, उससे भी उत्तर के बीमारु प्रांत गंभीर शिक्षा ले सकते हैं। उत्तर के सभी प्रांतों में दर्ज की गई तेज गति से जनसख्यां वृद्धि ने समस्त विकास को बेमानी बनाकर रख दिया है। आर्थिक विकास के साथ आत्मिक और नैतिक विकास को भी राष्ट्र के सामाजिक मर्म में समाहित किए बिना आर्थिक न्याय की बुनियाद कदाचित नहीं रखी जा सकेगी। प्रबल-सक्षम कानून-व्यवस्था का संगीन अपराधों पर कड़ा प्रभावी नियंत्रण किसी भी इलाके में निरंतर आर्थिक विकास गति कायम बने रहने की मौलिक शर्त होती है। दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में कानून-व्यवस्था की हालत वर्षों से लचर-मचर रही है, जिसका सीधा सरल प्रभाव इन इलाकों के पूंजी निवेश पर कायम रहा है। बिहार का उदाहरण स्पष्ट तौर पर इंगित कर रहा है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति में प्रभावी सुधार ने आर्थिक विकास को गति प्रदान कर डाली है। आर्थिक प्रगति को सशक्त आर्थिक न्याय से जोड़कर ही उत्तर भारत विकास के नए अध्याय लिख सकेगा। मेहनतकश गरीबों के नारकीय झोपड़े जब शानदार मकानों में तब्दील हो जाए, तभी समझा जाएगा कि भारत ने वस्तुतः आर्थिक प्रगति अंजाम दे डाली है।

(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)