केंद्रीय राजसत्ता ने जिस तरह का नश़ृंस व्यवहार दिल्ली बस बालात्कार की वारदात के
विरोध में प्रदर्शन कर रहे नौजवान प्रदर्शकारियों के साथ अंजाम दिया ,उससे सामंती
अंहकार से लबरेज राजसत्ता का वास्तविक चरित्र खुलकर राष्ट्र के समक्ष आ गया है।
सत्ता के अंहकार में गर्क हुक्मरान शीर्ष नेताओं ने नौजवानों से जब दो दिनों तक
सीधे बातचीत का आगाज नहीं किया, तभी आक्रोशित नौजवानों का क्रोध पथ्थरबाजी में
तब्दील हुआ। राजपथ पर प्रदर्शन के प्रथम दिवस पर ही जबकि प्रदर्शन एकदम शांतिपूर्ण
था तभी पानी की बौछारों, लाठी चार्ज और आँसू गैस के गोलों ने कथित लोकतांत्रिक
यूपीए हुकूमत की असलियत उजागर करके रख दी थी। अगले दिवस को समस्त लोकतांत्रिक
मर्यादाओं को तार तार करते हुए सत्तानशीनों ने क्रूरता की तमाम हदों को बाकायदा छू
लिया। माओवादियों के साथ युवा प्रदर्शनकारियों की तुलना करके केंद्रीय गृहमंत्री
महादोय आखिर कहना क्या सिद्ध करना चाहते हैं। शांतिपूर्ण प्रर्दशनों के बलपूर्वक
कुचल कर क्या स्वंय ही राजसत्ता हिंसक माओवाद को बढावा प्रदान नहीं कर रही है।
बर्बर शोषण-उत्पीड़न के नव पूंजीवादी दौर में केवल गहन लोकतांत्रिक आचरण ही भारत को
हिंसक आंदोलनों से विरत रख सकता है, जबकि किसान बड़ी तादाद में आत्महत्याएं अंजाम
दे रहे हैं और देश के नौजवान निराश-हताश हैं।
लीगल ज्यूरिसप्रूडेन्स की प्रसिद्ध उक्ति है, जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड। भारत पर
यह उक्ति शतप्रतिशत लागू होती है, जहां तकरीबन तीन करोड़ केस देश की अदालतों
मे फैसलों का इंतजार कर रहे हैं।
हमारे वतन में जघन्य अपराधों के लिए सख्त सजा प्रदान किए जाने का न्यायिक रिकार्ड
इतना अधिक खराब हो गया है कि जघन्य-नृशंस अपराधियों के दिलो-दिमाग में अब न्याय और
अदालत की कोई खौफ-ओ-दहशत शेष नहीं रह गई है। सिर्फ कानून-व्यवस्था की बातें करना
बंद करके,
राष्ट्र में त्वरित न्याय व्यवस्था स्थापित करने की मुहिम का प्रबल आगाज किया जाना
चाहिए। न्याय व्यवस्था की हकीकत है कि यदि उम्र दराज शख्स का हत्या कर देता है,
तो हत्या का उम्रदराज मुलजिम जमानत के पश्चात के जेल से बाहर रहकर
बिना कोई सख्त सजा भोगे, तमाम जिंदगी मजे में गुजार सकता है। अपराधों की तफ्तीश
पूरी होने के पश्चात, मुकदमों की अत्यंत तीव्रता से सुनवाई
करने के लिए पर्याप्त तादाद में न्यायाधीष ही हमारे वतन में तैनात नहीं हैं। सन्
1987 में विधि आयोग ने एक खाका तशकील किया था जिसके अनुसार
भारत में एक लाख की आबादी पर महज एक न्यायाधीष पद की स्थापना रही, विधि आयोग ने
बाकायदा सिफारिश की कि एक लाख जनसख्यां पर तत्काल तौर पर एक न्यायाधीष पदस्थापना को
बढ़ाकर पांच न्यायाधीषों की पदस्थापना पर पहुंचाया जाए। विधि आयोग की अहम सिफारिश को
पच्चीस व्यतीत हो चुके हैं और इस संजीदा सिफारिश के बावजूद,
हुकूमत द्वारा एक लाख की आबादी पर महज 1.5 न्यायाधीष पदस्थापना से ऊपर नहीं किया
गया।
आज फिर से जोरदार हलचल का गरमा-गरम माहौल है। टीवी,
रेडियो, अखबारों,
घर-बाहर, दफ्तर, बस स्टॉप,
मेट्रो, शहरों और देहातों में, समूचे राष्ट्र में तकरीबन प्रत्येक
स्थान पर जनमानस विकट रोष व्यक्त कर रहा है। सभी चाहते हैं कि जघन्य बलात्कार के
आरोपियों को सख्त से सख्त सजा प्रदान की जाए। लेकिन सजा क्या उन तमाम लोगों को भी
नहीं मिलनी चाहिए, जो घायल निर्वस्त्र पीडि़तों को
तमाशबीनों की तरह ताकते रहे? घायल निर्वस्त्र पीडि़तों को
उठाने में पुलिस की कोई इमदाद क्यों अंजाम नहीं दी? क्या यह
विकराल रोष भी उस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह उभरा, जो
कोई विराट घोटाला सामने आने पर यकायक उबल पड़ता है और फिर कुछ दिनों के पश्चात
अंततः शांत हो जाता है? शायद जघन्य बलात्कार और भीषण
भ्रष्टाचार को कदाचित नहीं जोड़ना चाहिए। यो दोनों अलग अलग राष्ट्रीय मसअले हैं,
किंतु दोनों को ही जघन्य अपराधों की कतार में शुमार किया जाता है। लेकिन कैसा पतित
समाज है, यहां न तो नैतिक मूल्यों की कोई औकात रही है,
ना ही फिर इंसानियत की कोई वक़त शेष है। किसी एक हादसे के
तत्पश्चात कुछ दिनों तक बेहद हो-हल्ला मचता है। तब राजसत्ता के अलंबरदार सरकारी
अफसरान और राजनेता दुम दबाकर बैठ जाते हैं। कुछ दिनों बाद सब कुछ यथावत और शांत हो
जाता है।
मीडिया में, टीवी और अखबारों में, सडकों से संसद तक चाहे कितना भी तर्क-वितर्क और
जोशीली चर्चा क्यों न कर लें और सड़कों, गलियों-कूचों और चौराहों पर कितनी भी
नारेबाजी कर लें अथवा मोमबत्तियां जला ले। क्या वस्तुतः इस देश और समाज में क्रांति
तो बहुत दूर की बात रही, क्या एक मामूली सा बदलाव करना भी दुश्वार सिद्ध नहीं हो
रहा?
हमारी न्यायपालिका, पुलिस-प्रशासन व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था के लिए ढेरों
शासकीय आयोगों द्वारा अनेक शानदार सिफारिशों के बावजूद विगत 65 वर्षों की आजादी के
दौरान ब्रिटिशकालीन व्यवस्था में किंचितमात्र बुनियादी परिवर्तन नहीं लाया जा सका।
पुलिस व्यवस्था में सुधारों के लिए धर्मवीर आयोग से लेकर कितने ही आयोगों की
सिफारिशें बंद अलमारियों में कैद पड़ी हैं। न्याय व्यवस्था सुधार की खातिर विधि
आयोग की एक भी सिफारिश को हुकूमत ने लागू करके अंजाम तक नहीं पंहुचाया। एक ताकतवर
लोकपाल संस्थान का सृजन इतने विशाल जनआंदोलन के पश्चात भी मुमकिन नहीं हो सका।
यथास्थितिवादी ताकतें हुकूमत में इतनी अधिक मजबूत हैं कि राजसत्ता में किसी सवाल को
सुलझाने की राजनीतिक इच्छा शक्ति शून्य होकर रह गई है। इसीलिए तो हुकूमत केवल और
केवल आर्थिक बदलाव लाना चाहती हैं, सामाजिक-राजनीतिक
व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन कतई नहीं करना चाहती। देश के सभी दरवाजे खोल दिए गए
कि विशाल विदेशी पूंजी आएगी। विगत 21 वर्षों में विदेशी पूंजी के साथ विकृत
सांस्कृतिक-सामाजिक बदलाव भी आए। उपभोक्ता स्वभाव का आत्मकेंद्रीत लालच भी साथ आ
गया। दमित इच्छाएं बेहद बढ़ गई, तमाम तरह के मनोविकार समाज
बढ़ गए। क्या इन सबसे निपटने की तैयारी हमने कभी कुछ की है?
हम शायद अपनी परम्परागत समृद्ध नैतिक सांस्कृतिक को लेकर अत्यंत आत्ममुग्ध हैं। कभी
समाज ने सोचा-विचारा कि यह सांस्कृतिक परंपराएं अब केवल सांस्कृतिक समारोहों और
साहित्य तक ही सीमित रह गयी है, और आज की नौजवान पीढ़ी में
ये सभी आउटडेटेड मानी जाती हैं ।
जंग ए आजादी के
योद्धाओं को भारतीय लोकतंत्र से प्रबल आस-उम्मीद रही कि स्वतंत्रता,
समानता और भाईचारे की अवधारणा का व्यवहारिक समावेश असल जिंदगी में
हो पाएगा। लेकिन व्यवस्था का दुश्चक्र हमें कितनी दूर तक घनघोर अनैतिकता की ओर ले
गया। धन, ऐश्वर्य, विलासिता, हत्या,
डकैती, लूटमार और बालात्कार ही इस देश की नई कॉरपोरेट तहजीब और संस्कृति की
वास्तविक पहचान बनकर रह गए हैं। शिक्षा व्यवस्था कथित सफल नागरिकों का विकृत
निर्माण कर रही है। गौरवमयी नैतिक मानव की संरचना करना अब शिक्षा व्यवस्था का
किंचित मकसद नहीं रह गया। कॉरपोरेट समाज को जिसे अपनी आर्थिक-बौद्धिक समृद्धि को
लेकर इतना गरुर हो गया, कि इसे अब पाशविक भी नहीं कहा जा
सकता। पशु कभी अपने समाज और प्रकृति के बुनियादी नियमों का कदाचित उल्लघंन नहीं
करते। वे इस मायने में जानवर हमसे कहीं बेहतर सिद्ध हो रहे हैं कि उनके जीवन की
अपनी मर्यादित गरिमा कायम है। कथित समृद्ध विकासशील भारत के नागरिक गण बड़ी तादाद
में तो होने की गरिमा तक भुला चुके हैं। सभ्य देशभक्त नागरिकों को कुछ भी सार्थक कर
पाने में अपनी असमर्थता पर क्षोभ भी होता है। किसी भी समाज में अपराध तभी इस कदर
बढ़ता है, जब कानून-व्यवस्था और राजसत्ता स्वयं जघन्य
अपराधों में संलिप्त हो जाए। वस्तुस्थिति यह है कि आज जितना अपराध देश के थानों के
अंदर होता है, उतना तो सड़कों पर भी नहीं होता। हालत तो यह
हैं कि महिलाओं की बात तो छोड़ दीजिए, कोई शरीफ पुरुष तक
थाने जाने से खौफ खाता है। यदि किसी के शरीफ इंसान के दरवाजे पर पुलिस पहुंच जाती
है, तो उसे सुरक्षा भावना नहीं मिलती,
बल्कि लगता है कि बिना बात कोई आफत आ गई।
(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्योरिटी एडवाईजरी काऊंसिल)