नौ अगस्त के लिए विशेष

 1942 भारत छोड़ो आंदोलन

 प्रभात कुमार रॉय

 

    मैं तो एक ही चीज लेने जा रहा हूं-आज़ादी! नहीं देना है तो कत्ल कर दो। आपको एक ही मंत्र देता हूं करगें या मरेगें। आज़ादी डरपोकों के लिए नहीं है। जिनमे कुछ कर गुजरने की ताकत है, वही जिंदा रहते हैं।  8 अगस्त 1942 की रात्रि को कांग्रेस महासमिति के समक्ष भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव पर बोलते हुए महात्मा गांधी ने उपरोक्त शब्द कहे, जोकि इतिहास का अहम दस्तावेज बन गए। महात्मा गांधी इस अवसर पर हिंदी और अंग्रेजी में तकरीबन तीन घटों तक बोले। महात्मा की तक़रीर के पूरे समय तक अजब सन्नाटा छाया रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनका एक एक शब्द में देश की मर्मान्तक चेतना को झिंझोड़ता रहा और उसे उद्वेलित करता रहा। 

   सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इसके नेता महात्मा गांधी के संघर्ष का एक ऐसा क्रांतिकारी काल रहा, जिसमें अंग्रेजी राज के विरुद्ध भारत के जनमानस को निर्णायक संग्राम के लिए ललकारा गया। महात्मा गांधी की ललकार पर लाखों भारतवासी करो या मरो के मंत्र पर अपने जीवन को जंगे ए आजादी के लिए आहुत करने के लिए अपने घरों से निकल पड़े। भारत छोड़ो आंदोलन के इन बलिदानियों में सबसे अधिक संख्या नौजवानों की थी।

  

 महात्मा गांधी की सबसे महान कामयाबी यह रही कि उन्होने कांग्रेस के आंदोलन को केवल पढे- लिखे लोगों के सीमित दायरे से बाहर निकाल कर भारत के विशाल जनमानस से जोड़ दिया। देश के गांव देहात के करोड़ों किसान मजदूरों को झकझोरा और उनकी चेतना को आजा़दी के सतत् संग्राम के साथ संबद्ध कर दिखाया। यही कारण रहा कि भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय तौर पर भागीदारी करने वालो में ग्रामीण इलाकों के साठ फीसदी से अधिक लोग रहे। आजा़दी के आंदोलन के इतिहास में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन सबसे अधिक ताकतवर गरिमामयी और ज्योतिर्मय अध्याय है ।

   

महात्मा गांधी का भारतीय जनमानस पर किस कदर असर रहा इस बात का दर्शाने के लिए कविवर सोहनलाल द्विवदी ने कहा था...

 

चल पड़े जिधर दो डगमग पग चल पड़े कोटि पग उसी ओर

पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि गड़ गए कोटि दृग उसी ओर

जिस सिर पर निज धरा हाथ उसके सिर के रक्षक कोटि हाथ

जिस पर निज मस्तक झुका दिया झुक गए उसी पर कोटि माथ

 

 

 दूसरे महायुद्ध का आग़ाज होने के बाद पराधीन भारत को ब्रिटिश सरकार ने स्वतः ही युद्ध में घसीट लिया गया। काँग्रेस के नेताओं ने भारत का पूर्णतः आज़ाद कर देने के लिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल तथा ब्रिटिश हुकूमत से गुज़ारिश की। कांग्रेस की पुकार को ब्रिटिश शासकों ने एकदम अनसुना कर दिया। महज खानापूर्ति के तौर क्रिप्स मिशन को भारत भेज दिया। जिसने महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात भारत को आजादी देने की बात पेश की । इस पेशकश को कांग्रेस ने एकदम खारिज कर दिया। महात्मा गांधी ने साफ साफ शब्दों में क्रिप्स महोदय से कहा कि जब आपके पास बस इतनी सी बात है तो अच्छा है कि जो सबसे पहला हवाई जहाज आपको मिले आप उससे ही लंदन वापिस लौट जाएं। 

     

 बम्बई में कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक 7 अगस्त 1942 को आयोजित की गई। 8 अगस्त सन् 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरु ने प्रस्तुत किया। जिसे कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। प्रस्ताव पारित होने के पश्चात उसी रात महात्मा गांधी सहित कांग्रेस सभी वरिष्ठ नेताओं को ब्रिटिश पुलिस ने बाकायदा गिरफ्तार कर लिया। 9 अगस्त को आंदोलन की कमान कांग्रेस के कनिष्ठ नेताओं ने संभाल ली। देश के आम जनमानस ने अत्यंत विशाल पैमाने पर आंदोलन में सक्रिय शिरकत की। अरुणा आसफअली, अच्चुत पटवर्धन, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, उषा मेहता, एके गोपालन, यूसूफ मेहर अली सरीखे कांग्रेस नेता आंदोलन के क्षितिज पर उभरे और एक ऐसा विलक्षण संग्राम हुआ कि ब्रिटिश राज की नींव हिल गई।

  

पटना के नौजवान विद्यार्थियों ने तो बलिदानों का अद्भुत स्वर्णिम इतिहास ही रच डाला। पटना सक्रेटेरिएट के समक्ष नौजवानों का एक जूलूस पंहुचा, सभी अपनी जान की बाजी लगाने के लिए उद्यत थे। ब्रिटिश पुलिस अफसर आर्चर अपने दस्ते के साथ वहां मौजूद था। ब्रिटिश सेक्रेटेरिएट पर तिरंगा फहराने का प्रयास करते हुए एक के बाद एक गयारह नौजवानों को आर्चर के पुलिस दस्ते ने अपनी गोलियों का निशाना बना डाला जिनमें से सात ने वही दम तोड़ दिया था। आखिरकार एक नौजवान सेक्रेटेरिएट पर तिरंगा झंडा फहराने में कामयाब सिद्ध हुआ। उसको भी ब्रिटिश पुलिस ने अपनी गोली का निशाना बनाकर शहीद कर दिया।

  

सन् 1942 में देश में आज़ादी के लिए एक नई चेतना का उदय हो हुआ । जिसका पूरा श्रेय महात्मा गांधी और कांग्रेस को दिया जाना चाहिए । महात्मा गांधी का स्पष्ट कहना था कि अंग्रेजों को भारत की धरती पर एक मिनट के लिए भी बने रहने का कोई हक नहीं है। उन्हीं दिनों अमेरिका के प्रख्यात पत्राकार लुई फिशर भारत आए और जून 1942 में गांधी जी के साथ सेवाग्राम में रहे। लुई फिशर ने बड़ी ईमानदारी के साथ 1942 की घटनाओं का विश्लेषण किया। गांधी जी ने फिशर से कहा था कि महायुद्ध के बाद स्वाधीनता में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं। वह अभी स्वाधीनता चाहते हैं। दूसरे महायुद्ध के दौरान जब समूची दूनिया में हिंसा का तांडव हो रहा था और भारत में महात्मा अपना अहिंसक संग्राम का बिगुल बजा चुके थे।

    

 सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में करो या मरो का नारा लगाते हुए दस हजार से अधिक भारतवासी शहीद हुए। एक लाख से अधिक आंदोलनकारी ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था क़रार दे दिया गया। अनेक स्थानों पर ब्रिटिश शासन को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। भारत के गांव गांव में यह आंदोलन फैल गया था। बलिया, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सतारा, कोल्हापुर, तालचर, तामलुक, मुर्शिदाबाद आदि अनके जिलों पर आंदोलनकारियों का कब्जा हो गया। बलिया पर पुनः नियंत्रण करने के लिए ब्रिटिश वायुसेना को बमबारी करनी पड़ी। जबरदस्त ब्रिटिश दमन के कारण आंदोलन भयावह रुप से हिंसक हो उठा था। आंदोलनकारियों ने रेल पटरियां उखाड़ फेकीं, टेलीफोन के तारों को तहस नहस कर दिया और बहुत सारे डाकखानों को ध्वस्त कर डाला। विशाल पैमाने पर समूचे देश में शासकीय संपत्ति को भारी नुकसान पंहुचाया।

        

 गांधी जी ने कहा था कि 29 अगस्त के बाद की घटनाओं पर मुझे बहुत खेद है। किंतु ब्रिटिश सरकार ने ही जनता को भड़का कर पागलपन की सीमा तक पंहुचा दिया। मैंने जीवन भर अहिंसा के लिए प्रयत्न किया फिर भी अंग्रेज शासक मुझ पर हिंसा इल्जाम लगा रहे हैं। इसलिए मेरे दर्द को कोई मरहम नहीं मिल सकता। मैं एक सत्याग्रही के नियम का पालन करुगां अर्थात अपनी शक्ति के अनुसार उपवास करुगां जोकि 9 फरवरी को प्रारम्भ होगा और इक्कीस दिनों के बाद खत्म होगा। प्रख्यात समाजवादी नेता और लेखक रामवृक्ष बेनपुरी ने अपनी पुस्तक जंजीरे और दिवारें में सन् 1942 के आंदोलन का अत्यंत सजीव चित्रण किया। उन्होने लिखा कि एक अजब समां पूरे देश में पैदा हो गया। हर शख़्स नेता बन गया और देश का प्रत्येक चैराहा करो या मरो आंदोलन का दफ्तर बन गया। देश ने स्वयं को क्रांति के हवन कुंड में झोंक दिया। क्रांति की ज्वाला देश भर में धू धू कर जल रही थी। बम्बई ने रास्ता दिखा दिया। आवागमन के सारे साधन ठप हो चुके थे। थानों पर कब्जा किया जा रहा था। कचहरियां विरान हो चली थी। भारत के लोगों की वीरता और ब्रिटिश सरकार की नृशंसता की खबरें आ रही थी। जनता ने करो या मरो के गांधीवादी मंत्र को अच्छी तरह से दिल में बैठा लिया।

    

 सन् 1857 के पश्चात देश की आजादी के लिए चलाए जाने वाले सभी आंदोलनों में सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदेालन सबसे विशाल और सबसे तीव्र आंदोलन साबित हुआ। जिसके कारण भारत में ब्रिटिश राज की नींव पूरी तरह से हिल गई थी। आंदोलन का ऐलान करते वक़्त गांधी जी ने कहा था मैंने कांग्रेस को बाजी पर लगा दिया। वह कामयाब होगी अथवा मर मिटेगी। यह जो लड़ाई छिड़ रही है वह एक सामूहिक लड़ाई है। सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारत के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता रहा। भारतीय जनमानस की विशाल पैमाने पर भागीदारी के कारण यह आंदोलन वस्तुतः क्रांति में ही तब्दील हो गया। अगस्त क्रांति के शहीदों के बलिदान व्यर्थ नहीं गए। आंदोलन अपने मक़सद को हासिल करने में कारगर सिद्ध हुआ। दूसरे महायुद्धे के समापन के बाद अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भारत से अपना बोरिया बिस्तर समेट लेना ही श्रेयस्कर प्रतीत हुआ।