लोकतंत्र में राजसत्ता का सांमती आचरण

 प्रभात कुमार रॉय

समझ नहीं पा रहा हूं कि सड़कों पर उतरे, मोमबत्तियां जलाते, नारे लगाते ये लोग सरकार को खतरा क्यों दिखाई दे रहे हैं! इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली की सरकार, पुलिस-प्रशासन और केंद्र की सरकार पूरी संवेदना के साथ सक्रिय हो गई होती और एक-एक कर कदम उठते दिखाई देने लगते तो मैं समझ सकता था कि लोगों का ऐसे धीरज खोना बहुत ठीक नहीं है। लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं हुआ! 


घटना की वीभत्सता जैसे-जैसे मन पर उतरी वैसे-वैसे लोगों की चीख घनीभूत हुई। हमने देखा कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने बड़े आराम से बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस में, बड़े इत्मीनान से घटना का ब्योरा देकर, पत्रकारों से पूछा कि अब आपको कोई सवाल करना हो तो कीजिए (वरना जाइए, हमें दूसरे भी काम हैं!)। और जैसे ही कुछ परेशानी में डालने वाले सवाल बनने लगे, तुरंत ही उनके तेवर बदल गए और वे कहते सुनाई दिए कि यह बहुत ही नाजुक मसला है, इसे आप इधर-उधर की बातों से जोड़ कर हल्का मत बनाइए। पुलिस का कुल रवैया इतना ही था कि घटना बता दी जाए, तुरंत आधी-अधूरी गिरफ्तारियों की घोषणा कर दी जाए और फिर लोग हमें अपनी तरह से चलने को छोड़ दें। ऐसा ही तो हमेशा हुआ है, इस बार भी होगा। 


दिल्ली की मुख्यमंत्री हमेशा राजनीतिक रूप से चाक-चौबंद रहती है और हमलावर जवाब देती हैं। इस घटना के संदर्भ में भी वे ऐसी ही थीं कि अब दिल्ली जैसी महानगरी में, किसी कोने-खोपचे में कुछ घट जाता है तो क्या आप सरकार को सूली पर चढ़ा देंगे? पुलिस आयुक्त नीरज कुमार और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित में बड़े मार्के  की जुगलबंदी थी। आगे हमने देखा कि पुलिस आयुक्त ने जो और जैसी जानकारी दी थी, लोकसभा में वही और वैसी ही जानकारी गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दे दी।  एक ढर्रा है- घटना घटती है, सरकार एक-दो वाक्य में उसे निबटा देती है और फिर उस पर राख डाल दी जाती है। यह घटना तो थी भी ऐसी कि दिल्ली जैसे महानगर में... देर रात के करीब... शहर से इतनी दूर... किसी वीरान-से इलाके के बस स्टॉप पर वह लड़की कर ही क्या रही थी?... और वह भी एक लड़के दोस्त के साथ? जब ऐसा था तो क्या करें हम कि ऐसी अभागी घटना घट गई! ... लड़की को भी तो खयाल रखना चाहिए था... हमें दुख है, हम ज्यादा सावधानी रखने का निर्देश दे रहे हैं... यही पुलिस का रवैया था, यही शीला दीक्षित का रुख था और यही लोकसभा में माहौल था।

इन सारे बनावटी चेहरों की नकाब नोच डाली लोगों की स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया ने। हमारे मुल्क के किसी राजनीतिक दल के बूते में नहीं है कि वह किसी भी मसले पर लोगों को इस कदर उद्वेलित कर सके। इसलिए किसी दल ने ऐसा मुगालता नहीं पाला और यह उनकी सेहत के लिए अच्छा ही हुआ। इनमें से कोई भी, कहीं भी लोगों के बीच उतर आता और अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करता तो उसकी क्या गत होती, इसका अनुमान करना मुश्किल नहीं है। इसलिए कहीं कोई पार्टी वाला दो-चार लोगों को लेकर भीड़ में आ गया हो तो आ गया हो लेकिन यह सारा उभार गुस्से से भरे, लाचारी से परेशान और फिर भी न सह पाने की विवशता महसूस करते युवाओं का उभार था। बहुत संयत था, बहुत थोड़ी बात करता था और थोड़ी-थोड़ी संख्या में यहां-वहां उतर रहा था। उसके प्रति राजनीतिक प्रतिक्रिया कैसी रही

शीला दीक्षित के घर के सामने इन सब पर पहली बार पानी की तोपें दागी गर्इं। यह रवैया हैरान कर देने वाला था। जब आप भी कह रही हैं कि पीड़ा से मन भरा हुआ है, जब आप भी टीवी के परदे पर आंसुओं से अपनी बात कहने की कोशिश कर रही हैं तब वैसे ही संताप से भरे युवाओं के साथ सड़क पर ऐसा व्यवहार क्यों? दिल्ली की मुख्यमंत्री ने उस दिन उत्तेजना फैलाने का पहला काम किया! और यह भी कहा कि लोग आएं, प्रदर्शन करें, शांति से मुझसे मिलने आएं तो मैं कहां मना करती हूं लेकिन ऐसे सवाल पर राजनीति तो न करें। वे क्या सोचती थीं कि ऐसे माहौल में लोग कतार बना कर, हाथ में फूल-मालाएं लेकर आएंगे और आपसे विनती करेंगे कि हमें दर्शन दीजिए? यह आहत मन के लोगों की पीड़ा थी जिस पर पानी की बौछार करने की नहीं, सांत्वना का मरहम लगाने की जरूरत थी। 

लोकसभा में सारे लोगों ने शब्दों का पटाखा बहुत फोड़ा लेकिन उसमें ईमानदार पीड़ा की बहुत कमी थी। साधारण जन का भरोसा इतनी बार, इतनी तरह से टूटा है कि वह अब आसानी से भरोसा नहीं करता है। स्मृति ईरानी कितने भी कांपते स्वर में ऐसी घटना की निंदा करें और बलात्कारी को फांसी मिले, इसकी वकालत करें, लोगों को वह छूता नहीं है। सुषमा स्वराज, मायावती, जया बच्चन, सब ने शब्दों में कोई कंजूसी नहीं की। लेकिन कैसे कोई भूल जाए कि अपने-अपने वक्त में इन्हीं सबने बलात्कारियों के साथ कैसे-कैसे तालमेल बिठाया है! 


सड़कों पर लोग अपनी बच्चियों और दोस्तों के साथ बलात्कार देखें और फिर भी यह भूलते रहें कि आप सबकी छत्रछाया में ही देश में कहीं गुजरात हुआ है, कहीं अलग उत्तराखंड के आंदोलन को बलात्कार से कुचलने की दरिंदगी की गई है, उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार में कैसे-कैसे लोग मंत्री बने बैठे हैं और जब बसपा की सरकार के वक्त में वहां बलात्कार की घटनाएं उभरी थीं तो उसे नाटकबाजी और व्यवसाय का नाम किसने दिया

 

था! ...किस-किस पार्टी के सांसद, विधायक, मंत्री, अधिकारी, निगमों के पदाधिकारी आदि हैं जिन पर   बलात्कार के मामले हैं, इसकी जानकारी लेकर सारी पार्टियां आगे आने की हिम्मत करेंगी लोगों के विश्वास की र्इंटें एक-एक कर खिसकी हैं। दिल्ली की इन्हीं सड़कों पर इसी तरह ऐसे ही युवा उमड़े थे जनलोकपाल की मांग लेकर! इसी तरह सारे वातावरण में बिजली दौड़ रही थी। तब यही संसद थी, ये ही चेहरे थे और ऐसी ही पवित्र घोषणाएं थीं। लोगों ने क्या देखा और क्या पाया? सबने देखा कि इस संसद के पास इसके अपने ही शब्दों का कोई मोल नहीं है। जनलोकपाल मिला या नहीं मिला, यह पूरी व्यवस्था लोगों के सामने नंगी हो गई। अब आप चाहते हैं कि लोग आपके उस वचन-भंग को भूल कर इस वचन पर विश्वास करें! 

इंडिया गेट पर लोग जमा हुए, मोमबत्तियां जलार्इं और न्याय मांगा। किसी मंत्री ने हिम्मत नहीं की कि वहां लोगों के बीच जाकर बैठें, उनके संतापग्रस्त मन के साथ एकरूप होने की कोशिश करें और उनसे संवाद भी बनाएं कि आखिर क्या है जो उन्हें न्याय के रूप में चाहिए? देश में प्रधानमंत्री नाम की सत्ता है, यह तो लोग भूल ही गए हैं लेकिन कोई दूसरा, कोई तीसरा भी तो नहीं आया। 


जंतर मंतर, विजय चौक आदि से यह दिशाहीन क्रोध गुजरता रहा। किसी ने भी आगे बढ़ कर इसके कंधे पर सहानुभूति का और दिशा बताने का हाथ नहीं रखा। संसद के भीतर और बाहर से, बड़े ओहदेदारों के यहां से बातें तो यही फूटती रहीं कि हमारी निजी राय में इसे फांसी ही मिलनी चाहिए लेकिन कानून है! इससे लोगों का मानस क्या बनता है? यही न कि फांसी ही एकमात्र रास्ता है और इसे चौक-चौराहे पर देकर लोगों की मानसिक बर्बरता को संतुष्ट करना चाहिए! किसी ने कहा भीड़ में से कि फांसी क्या, उन सबको बस हमें सौंप दो, हम देख लेंगे कि क्या करना है। देश में ऐसी मानसिकता अकारण नहीं बन रही है। विफल सरकारों और निराश लोगों का यह समीकरण हमें ऐसे ही बर्बर समाज की तरफ ले जाएगा। 

लोग तो राष्ट्रपति भवन के द्वार पर जा पहुंचे थे। उतने बड़े प्रदर्शन को वहां तक पहुंचने की छूट देकर बहुत सयानेपन का परिचय दिया था दिल्ली प्रशासन ने! सोचता हूं कि कितना सुंदर होता कि जैसे ये लड़के-लड़कियां राष्ट्रपति भवन के द्वार पर पहुंचे, वैसे ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बाहर आ जाते! वे तो जनता के राष्ट्रपति बनना चाहते हैं न! यही मौका था। वे एक बार इनके बीच आ जाते और इनकी बातें सुनते, इन्हें पानी पिलवाते और फिर इन्हें बताते कि इस मामले में वे निजी पहल कर रहे हैं और संविधान-सम्मत कोई भी रास्ता वे छोड़ेंगे नहीं कि जिससे इन अपराधियों को अधिकतम सजा मिले, अपनी जिम्मेवारी से विफल हुए बड़े-छोटे सारे अधिकारियों को उनकी सजा मिले और देश में कहीं भी ऐसा कुछ करने से पहले लोग दस बार सोचने पर विवश हो जाएं ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी हो। कोई दस मिनट की यह पहल होती! इतना किया होता राष्ट्रपति ने तो इस अभागी घटना ने एक संभावनापूर्ण मोड़ ले लिया होता और संविधान-सम्मत रास्ते की तरफ देश मुड़ गया होता। 

सोनिया गांधी के दरवाजे तक भी लोग पहुंचे थे। वहां भी सब कुछ बंद था। सोनिया गांधी की जगह दो-चार युवाओं से मिले मोतीलाल वोरा, जिनसे आज कोई कांग्रेसी भी किसी गंभीर मामले पर नहीं मिलना चाहेगा। दूसरे दिन फिर दो-चार को सोनिया जी ने भीतर बुलवाया और सरकारी ढंग की बात की। न तो यह तरीका अवसरानुकूल था और न वे बातें! ये हमारे बच्चे थे जो हमारे दरवाजे पर आए थे। हम दरवाजा खोल कर उनसे मिल भी नहीं सके!

सुरक्षा का बहुत बड़ा हौवा बना हुआ है और इसलिए हमारी व्यवस्था को हर आदमी अपराधी या हत्यारा ही नजर आता है। अगर ऐसा हो भी तो भी इस त्रासदी से लड़ना ही एकमात्र रास्ता है। यह मौका था जब सोनिया गांधी अविश्वास की इस परत को बेध सकती थीं। लेकिन वह मौका भी गंवा दिया गया। 

अंधाधुंध गोलियां चला कर अभी-अभी अमेरिका में बच्चों की हत्या हुई थी। सारा देश स्तब्ध था। उस वहशी हत्याकांड के बाद शब्द बहुत खोखले और छोटे पड़ रहे थे। लेकिन राष्ट्रपति ओबामा टीवी पर राष्ट्र से सीधे बात करने आए। और सारा कुछ तो उनके आंसुसों ने ही कह दिया! अमेरिकी समाज की, अमेरिकी मानसिकता की और अपने प्रशासन की सीमाओं की बात और उनकी विफलता राष्ट्रपति खूब जानते हैं और इसलिए आंसू और पछतावा और पीड़ितों से खुद को एकाकार करने की ईमानदार तड़प ही थी जो वे उस गाढ़े वक्त में देश को दे सकते थे। वही उन्होंने किया। 


हमारा देश के साथ ऐसा कोई रिश्ता ही नहीं है क्या? उनका जवाब वे जानें लेकिन हम आम आदमियों के पास तो यह देश ही पहली और आखिरी पूंजी है। इसलिए इस घटना के आईने में हम सब अपना चेहरा देखें और अपने-अपने घरों की तरफ लौट जाएं। घरों में बंद होने के लिए नहीं, घर और समाज को जोड़ने के लिए! आज जो भी, जहां भी सड़कों पर उतरा है वह कसम खाए कि हम इन सड़कों की सतत निगरानी करेंगे। कोई लड़का इस सड़क पर किसी को छेड़े या अपमानित करे, कोई पुलिसवाला किसी से अमानवीय व्यवहार करे, कोई रंगदारी करे या अपनी राजनीतिक हैसियत का नाटक करे तो उसे कभी, कहीं छोड़ेंगे नहीं! टोकना-रोकना-हटाना- सड़क पर यही आज हमारा लोकतांत्रिक कर्तव्य है। यह लड़ाई खुद से लड़े बगैर लड़ी नहीं जा सकती, यह भी ध्यान रहे।