पंजाब में विवाह के रीति-रिवाज़ !

Posted: 13 June 2012 

- R.D. Bharadwaj "Noorpuri" 

 
 
         जब से भगवान ने सृष्टि की रचना की है और सभ्यता में थोड़ी उन्नति की है, समय-समय पर नौजवान लड़के-लड़िकयाँ पारिवारिक जीवन में बंधते आ रहे हैं और इस पारिवारिक जीवन में बंधने  की प्रत्येक जाति, धर्म या फिर वहां के क्षेत्र के पूर्वजों ने कुछ मान्यताएं, रस्में या रीति-रिवाज बनाए हैं, जिसको उन्होंने विवाह या शादी की संज्ञा दी है।  जब लड़का या लड़की उम्र के एक निश्चित पड़ाव पर पहुंचते हैं या उसे पार कर लेते हैं तो तब वे विवाह के बंधन में बंधने योग्य हो जाते हैं ।  इस बंधन में बांधने के लिये केवल हमारे मां-बाप, बहन-भाई और परिवार के बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि सभी रिश्तेदार, दोस्त-मित्र, आस-पड़ोस के लोग, गांव-मोहल्ले के पंडित या गुरूद्वारे के ग्रंथी / पाठी की भी एक निश्चत भूमिका होती है ।  इन सब लोगों के सहयोग से, माता-पिता और घर के बड़े-बुज़ुर्गों के आशीर्वाद से ही शादी की अनेकों रस्मों व रीति-रिवाज़ों में से गुज़रते हुए ही शादी की संस्था सम्पन्न होती है, जिसको न केवल सामाजिक, बल्कि धार्मिक मान्यता भी प्राप्त होती है और ऐसे नव-विवाहित जोड़े को हमारा समाज इज्ज़त की नज़र से देखता है और उन्हें इस संस्था में कामयाब होने के लिये लोग आशीर्वाद और शुभकामनाएं देते हैं ।

         
वैसे तो प्रत्येक धर्म, क्षेत्र और जाति-पाति में शादी की अपनी-अपनी रस्में व रीति-रिवाज़ होते हैं, मगर इस लेख के माध्यम से मैं पंजाब में आमतौर पर माने व निभाए जाने वाले रीति-रिवाज़ों का ही  जिक्र / विवरण, पाठकों की जानकारी हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो कि इस प्रकार है : -

1.      
गोत्र असमानता   :       जब भी किसी लड़की या लड़के के लिये कोई रिश्ता आता है, प्रथम दृष्टया बाकी पहलुओं पर रिश्ता जंचने पर  दोनों पक्षों के  गौत्र देखे-परखे जाते हैं ।  आम तौर पर जिन चार रिश्तेदारों के गोत्र देखे और मिलाए जाते हैं, वह हैं माता, पिता, दादी व नानी ।  लड़के के पक्ष के ये चारों गोत्र लड़की के इन चारों गोत्रों से मिलाए जाते हैं ।  शादी पक्की करने के लिये इन दोनों पक्षों के इन चारों गोत्रों में से एक भी गोत्र नहीं मिलना चाहिए ।  दोनों तरफ से गोत्र असमानता होने पर ही रिश्ता पक्का किया जाता है ।

       गोत्र असमानता देखने-परखने और उसे मानकर ही शादी करने का यह सिद्धान्त वैज्ञानिक दृष्टि से भी शादी के उस सिद्धांत से कहीं बेहतर / अच्छा है जहां पर अपने ही चाचे, ताये / मौसी / बुआ या मामी की लड़की के साथ शादी कर दी जाती है, और ऐसी प्रथा हमारे देश के कुछ भागों में अभी भी प्रचलित है ।

2.      
रोका    :       रिश्ता पक्का हो जाने पर दोनों पक्षों द्वारा निर्धारित किये गये किसी एक दिन लड़की पक्ष से कुछ लोग, जिसमें लड़की के माता-पिता, भाई, मामा, चाचा, ताया वगैरह की उपस्थिति होनी ज़रूरी होती है, ये सभी रिश्तेदार लड़के वालों के घर आकर एक सादी सी रस्म करके लड़के पक्ष के मुख्य रिश्तेदारों की हाजिरी में लड़के को शगुन दे देते हैं ।  इस रस्म को रोका कहा जाता है  और इसके बाद दोनों पक्ष अपने बच्चों के लिये और रिश्ता देखने के लिये सामाजिक तौर पर रोक लगा दी जाती है, इसीलिए इसे रोका कहा जाता है ।

3.      
सगाई या कुड़माई  :       रोके के बाद सगाई (मंगणी) या कुड़माई की रस्म थोड़ी बड़ी रस्म होती है ।  इसमें दोनों पक्षों से ज्यादा संख्या में दोस्तों, गांव व गली मोहल्ले के लोगों व रिश्तेदारों की हाज़िरी होती है ।  लड़की पक्ष के लोग लड़के को उसके घर आकर शगुन देते हैं ।  शगुन में दी जाने वाली वस्तुएं / तोहफ़े दोनों पक्षों के सामाजिक व आर्थिक स्तर के मुताबिक ही होती है ।

4.      
तिथि निश्चित करना और निमंत्रण  -  रोके और मंगणी के बाद दोनों पक्षों की सुविधानुसार शादी की तारीख पक्की की जाती है ।  यह तारीख पक्की करने से पहले मन्दिर के पुजारी / पंडित या गुरूद्वारे के ग्रंथी की राय भी अवश्य ली जाती है - यह निश्चित करने के लिए कि शादी के लिये निश्चित की जाने वाली तारीख ग्रहों के मुताबिक शुभ हो ।

5.    
ननिहाल को निमंत्रण :    शादी-विवाह के मामले में दोनों पक्षों के ननिहाल वालों की बड़ी महत्त्वपूर्र्ण भूमिका होती है । इसीलिये शादी की तिथि निश्चित होने के बाद दोनों पक्षों के लोग, लड़की और लड़के के ननिहाल मिठाई लेकर जाते हैं और उन्हें विधिपूर्वक तरीके से शादी में आने और मामा की तरफ से जो भी रीति-रिवाज बनते हैं, उन्हें निभाने के लिये निवेदन करते हैं ।

6.      
मटना या हल्दी लगाना :   शादी से पहले, होने वाले दूल्हे और दुल्हन को पांच बार हल्दी लगाई जाती है, जिसको पंजाब में  "मटणा"  कहते हैं ।  ये मटना, बेसन, हल्दी और सरसों के तेल का एक मिश्रण होता है । पहला मटणा शादी से दो दिन पहले सुबह लगाया जाता है  और मटणा लगाने वाली औरतों / लड़कियों में मां, बहन, भाभी, ताईयां-चाचियां, मौसियां और गली मोहल्ले की औरतें भी शामिल हो हैं ।  ये महिलाएं मटणे / शादी से संबंधित गीत गाती हैं और भाभियां होने वाले दूल्हे (अपने देवर) को बड़े खट्टे-मीठे हंसी मज़ाक व हंसी ठिठोली भी करती हैं ।  इसी तरह दूसरा मटणा शाम को, तीसरा शादी से एक दिन पहले सुबह को, चौथा  उसी दिन शाम को और पांचवा मटणा शादी वाले दिन सुबह लगाया जाता है    पांचवें मटणें के बाद होने वाले दूल्हे को दही से नहलाया जाता है ।

7.      
सलामियां या शगुन :     शादी में सभी निमंत्रित दोस्त मित्र, रिश्तेदार व गांव के लोगों द्वारा शगुन की रस्म को पंजाब में  "सलामियां के नाम से जाना जाता है और ये रिवाज़ अपनी सुविधा अनुसार शादी से एक रात पहले या शादी वाले दिन ही सुबह निभाया जाता है, जिस में सभी आमंत्रित लोग गीत-संगीत के साथ दूल्हे को शगुन देते हैं ।

8.      
मेंहदी लगाना  :    मेंहदी शादी से एक रात पहले लगाई जाती है ।  दुल्हन के हाथों में जो मेंहदी लगाई जाती है, वह उसके ससुराल से शगुन की अन्य कई प्रकार की वस्तुओं के साथ आती है ।  रात को लगाई गई मेंहदी सुबह होने तक हथेलियों पर अपना रंग छोड़कर हथेलियों को रंगला बनाकर अपनी छाप छोड़ जाती है ।

          मेंहदी, मात्र हथेलियां रंगने का एक साधन ही नहीं है, बल्कि ये एक तरह का प्रतीक भी है जो कि दुल्हन को सन्देश देती है कि जैसे मेंहदी के पत्ते अपनी जड़ों (पौधे) को छोड़कर, अपना रंग-रूप बदलकर, एक नये स्वरूप में हथेलियों में दिखाई देती है, ठीक उसी प्रकार दुल्हन को भी अपनी जड़ें अर्थात् - माता-पिता को छोड़कर, एक नये रूप में, एक नये स्वरूप के साथ ससुराल जाना है और उसे वहां के माहौल में अच्छी तरह रस बस जाना है ।  दुल्हन का यही अब असली घर है और मेंहदी का छोटा सा परन्तु अति महत्त्वपूर्ण सन्देश भी यही है ।

9.      
स्वाँग रचना     :      विवाह शादियों के अवसर पर स्वाँग रचना एक ऐसी कला है जिसका प्रदर्शन दोनों पक्षों के घरों में होता है और उसमें लड़कों व पुरूषों का शामिल होना वर्जित होता है ।  जब महिलाएं गिद्धा (पंजाब में महिलाओं की एक नृत्य कला) में शामिल होती हैं, इसी परिवेश में उनकी एक और कला भी उजागर होती है, जिसे कहते हैं स्वाँग रचना, अर्थात् - नकल उतारना ।  गिद्धे में सम्मिलित सभी महिलाओं में से सबसे निपुण / कलाकार महिला पुरूष के वस्त्र धारण करती है और एक अन्य महिला स्त्री के ही रूप-स्वरूप में ही उसके सामने आती है ।  फिर इन दोनों महिलाओं में नोक-झोंक व छेड़-छाड़ का एक ऐसा सिलसिला शुरू होता है जिस में विभिन्न स्थितियों, प्रस्थितियों के अन्तर्गत किए जाने वाले विनोद वार्तालाप के सभी प्रकार के रस होते हैं ।  या फिर पुरूष वस्त्र धारण की हुई महिला गांव के उन आदमियों की नकल उतारते  हुई दूसरी महिला से छेड़-छाड़ करती है जिनका आचरण आम व्यक्तियों से भिन्न होता है, जैसे कि शराबी, भैंगा, लंगड़ा, जुआरी, कंजूस या फिर कोई अनुरागी या आशिक-मिजाज़ पुरूष या गाँव का कोई ओर लड़का, भले ही वह व्यक्ति गाँव का पंच, सरपंच या फिर नम्बरदार ही क्यों न हो ।  ऐसे सभी आदमी स्वाँग रचने वाली महिला के निशाने पर होते हैं और यह अपनी स्वाँग कला के माध्यम द्वारा खूब दिलचस्पी से गिद्धे में सम्मिलित सभी महिलाओं का भरपूर मनोरंजन करती है ।  कभी-कभी तो बाकी महिलाएं स्वाँग महिला से उसके अपने ही पति, देवर, ज्येष्ठ या फिर ससुर की भी नकल उतारने को कहती है, जो कि वह सहर्ष कबूल करती है और उस आदमी का भी पात्र चित्रण करती है और उसकी कला से बाकी सभी महिलाएं हंस-हंस कर लोट-पोट हो जाती है और खुश होकर स्वाँग महिला को नकद ईनाम भी दिया जाता है ।

10.    
ब्रह्म स्नान  :      शादी वाले दिन दूल्हे की मां, बहनें, भाभियाँ, मामियां व मौसियाँ इत्यादि सभी मिलकर गीत गाते हुए दूल्हे को स्नान कराती है ।  इसके बाद दूल्हे का मामा उसे गोदी में उठाकर अंदर ले जाता है ।  शादी के वक्त पहने जाने के लिए सभी कपड़े, सेहरा, जूते, जुराबें और रूमाल इत्यादि ननिहाल की तरफ से लाए गए होते हैं ।  दूल्हे के सिर पर सेहरा बांधा जाता है और भाभी दूल्हे की आंखों में सुरमा या काजल लगाती है और उसके लिए वे दूल्हे से शगुन वसूल करती है ।

11.    
गुरूद्वारे या मंदिर जाना  :      बारात की पूरी तैयारी होने पर और दुल्हन के घर जाने से पहले दूल्हा, उसके माता-पिता, बहनें, भाई-भाभियाँ, सभी मिलकर अपने गांव में बने गुरूद्वारे या मंदिर जाते हैं ।  भगवान के चरणों में माथा टेकते हैं ओर अरदास / विनती करते हैं कि सभी कार्य भगवान की कृपा  व आशीर्वाद से सही-सलामत और धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं के अनुसार सम्पन्न हो जाएं ।

12.    
बारात की चढ़ाई  :       इन सभी कार्यों के बाद बारात बैंड बाजे के साथ दुल्हन के घर की ओर प्रस्थान करती है ।  यहां पर मैं एक प्रमुख बात बताना अनिवार्य समझता हूँ कि पंजाब में अधिकांश शादियां दिन को ही होती हैं ।  गांवों में तो शत-प्रतिशत शादियां दिन में ही सम्पन्न होती हैं ।  शहरों में भी नगण्य लोग ही हैं, जो कि रात्रि में शादी करना पसन्द करते हैं ।  इसका एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक कारण शायद यह भी हो सकता है कि पुराने ज़माने में जब बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था, तब दिन के वक्त  शादी से सम्भिधित  ज्यादातर गतिविदियाँ सम्पन्न करना ज्यादा सुविधाजनक होता था और इस दिन में शादी करने का ये रिवाज़ तब से ऐसे ही चला आ रहा है ।

13.    
बारात का स्वागत और मिलनी  :     दुल्हन के  गांव पहुंचने से पहले ही लड़की वाले अपने सब रिश्तेदारों व गांव वासियों के साथ बारात के स्वागत में खड़े होते हैं ।  गुरूग्रंथ साहिब में दर्ज शब्द "हम घर साजन आए ...."  के उच्चारण के साथ पूरी बारात का अभिनन्दन किया जाता है ।  इसके बाद मिलनियों का सिलसिला शुरू होता है ।  सबसे पहले समधियों (जिन्हें पंजाब में कुड़म कहते हैं) की मिलनी होती है - यानि दुल्हन के पिता दूल्हे के पिता के गले में फूलों का हार डालकर उसका स्वागत करते हैं और दोनों समधी गले मिलते हैं ।  इसके बाद दुल्हन के मामा दूल्हे के मामा से इसी तरह मिलनी करता है ।  किसी-किसी परिवार में इसी तरह भाइयों की और चाचे-ताउओं  की भी मिलनी कराई जाती है और इन सभी मिलनियों मे दुल्हन पक्ष के लोग दूल्हे पक्ष के लोगों को अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार तोहफे भी देते हैं ।

       
बारात में आई हुई औरतों व लड़कियों के ठहरने व आराम करने की जगह अलग होती है और वहीं पर औरतों की भी इसी तरह मिलनियां होती हैं ।

14.    
नाश्ता   :      मिलनी के बाद पूरी बारात को पण्डाल में ले जाया जाता है और वहां पर सभी बाराती नाश्ता करते हैं ।  चाय नाश्ते के दौरान दुल्हन पक्ष की औरतें बारातियों को तरह-तरह के शादी के गीत  सुनाती  रहती  हैं, जिन्हें पंजाब में "सिठनियाँ"  के नाम से जाना जाता है ।  बारात में आए हुए मोटे-पते, काले व गोरे, नाटे और लम्बे आदमी  वह जमकर खाने वाले बाराती इन सिठनियों में औरतों के निशाने पर होते हैं ।  औरतों की इन सिठनियों का कोई भी बाराती बुरा नहीं मानता, बल्कि हंसी-खुशी के वातावरण में सभी इसका लुत्फ उठाते हैं और आनन्दित अनुभव करते हैं ।

15.    
फेरे या लावां  :        चाय नाश्ते के बाद बारात आराम कक्ष की ओर प्रस्थान करती है ।  बैण्ड बाजे के साथ बीच-बीच मे भंगड़ा भी चलता रहता है ।  इस तरह डेढ़-दो घंटे का समय बीत जाता है और  बारह बजे के आसपास फेरे या लावां की रस्म शुरू होती है ।  शादी की यह रस्म सात फेरों से निभानी है या चार लावां से, इसका निर्णय दूल्हा-दुल्हन के माता पिता पहले ही तय कर लेते हैं और बाकी का सारा कार्यक्रम इसी के मुताबिक ही चलता है ।

          भले ही यह रस्म सात फेरों से निभानी हो या फिर चार लावां से, दोनों के लिए शब्द गुरूवाणी (गुरूग्रंथ साहिब) मे से लिए जाते हैं ओर इसके अनुसार ही शादी के गठबंधन की रस्म सम्पन्न की जाती है ।  लावां के ये अनमोल शब्द सिक्खों के चौथे गुरू, श्री गुरू राम दास जी की रचना है, जो कि गुरूग्रंथ साहिब में "लावां" नाम के शीर्षक के अन्तर्गत दर्ज है ।  इस रस्म के शुरूआत में ही दूल्हें की इण्जड़ी, दुल्हन की चुन्नी के साथ बांध दी जाती है ।  गठबंधन की इस रस्म के बाद दूल्हे-दुल्हन को एक साथ बिठाकर फिर दुल्हन पक्ष के सभी आमंत्रित रिश्तेदार व दोस्त वगैरह नवविवाहित वर-वधू को शगुन देते हैं और इस तरह सलामियों की रस्म यहां पर भी निभाई जाती है ।  ये दोनों रस्में दोनों तरफ के रिश्तेदारों, दोस्तों-मित्रों या मंदिर क पुजारी / पंडित अथवा गुरूद्वारे के ग्रंथी की मौज़ूदगी में ही पूरी होती हैं और इनके पूरा होते ही दूल्हा-दुल्हन शादी के गठबंधन में बंध जाते हैं और हमेशा के लिए पति-पत्नी बन जाते हैं, जिसके लिए सामाजिक व धार्मिक मान्यताएं भी पूरी हो जाती हैं और गुरूद्वारे के ग्रंथी ये मधुर राग गाने लग जाते हैं - "व्याह हुआ मोरे बाबला ..... गुरमुख हरि पाया..... ।"

16.    
सेहरा खोलना और सालियों द्वारा जूते चुराना :  फेरे या लावां की इस रस्म के सम्पन्न होते ही दूल्हे का जीजा उसका सेहरा खोलता है और दूल्हे का पिता सेहरा खोलने वाले को शगुन के पैसे देते हैं ।  फेरों से उठते ही दूल्हे को पता चलता है कि उसके तो जूते ही गायब हो गये और उसे जूते ढूंढते हुए  उसे परेशानी में  देखकर सालियां खिल खिलाकर हंसती हैं और कहती हैं कि जब तक आप हमारे शगुन के पैसे नहीं देते, आपको नंगे पैर ही रहना पड़ेगा ।  जब जीजा सालियों को खुश करने के लिये शगुन देता है तब जाकर कहीं उसके जूते वापस किए जाते हैं ।

17.     दोपहर का खाना और स्त्री धन :   शादी के गठबंधन के बाद दोपहर का खाना शुरू होता है जिसमें मौसम के अनुसार तरह-तरह के मीठे व नमकीन व्यंजन होते हैं ।  दुल्हन के गांव की औरतें बारातियों का स्वागत सिठनियों से ही  करती हैं    वे अपने गीतों में बारातियों में से चुनिन्दा लोगों को ताने मारती हैं व उन पर फब्तियां भी कसती हैं ।  खाना खाने के बाद सदियों पुरानी रस्म अर्थात् बेटी को नया घर बसाने के लिए, घर में इस्तेमाल होने वाली और बेटी को तोहफे के रूप में दी जाने वाली आवश्यक वस्तुएं पूरे गांव की उपस्थिति में बारातियों को दिखाई जाती हैं जो कि स्त्री धन के नाम से जानी जाती थी, लेकिन आधुनिक युग में कुश लड़के वालों की इसके प्रति लालसा इतनी बढ़ चुकी है कि अब इसे दहेज की संज्ञा दे दी गई है, और गरीब परिवार वालों के लिए लड़के वालों की दहेज की मांग पूरी करना काफी मुश्किल बनता जा रहा है ।

18.    
सालियों द्वारा जीजे से छन्द की फरमाइश करना :     उपर्युक्त रस्म के पश्चात् कन्यापक्ष की नवयुवतियां व सालियां मिलकर अपने जीजे से अनुरोध करती हैं कि वह उनको छन्द सुनाए ।  छन्द या छन्न, अर्थात् - ऐसे शेयर सुनाना जिसका सम्बन्ध शादी से, पत्नी से साली से या विवाहित जीवन से होना चाहिए ।  अगर दूल्हा शायराना मिज़ाज़ या कवि हृदय हो तो वह ऐसे अवसर पर सालियों का दिल बड़ी आसानी से जीत लेता है ।  अगर उसे थोड़ी बहुत तुकबंदी भी नहीं आती तो छन्द की फरमाइश के समय चंचल व हास्य-विनोद सालियों के सम्मुख उसका पल भर के लिये भी टिक पाना बड़ा कठिन हो जाता है और उसे शर्मिंदा होना पड़ता है   ससुराल पक्ष की नवयुवतियों द्वारा जीजे के छन्द सुनने के पीछे दो महत्त्वपूर्ण बातें होती हैं ।  एक तो यह है कि ऐसे हास्य-विनोद व चंचल भरे माहौल में सालियां अपने जीजे से शीघ्र घुल-मिल जाती हैं और जान-पहचान करने का भी यह एक सुनहरा अवसर होता है ।  दूसरी बात यह होती है कि छन्द सुनने के बहाने वहां की लड़कियां यह भी जान लेती हैं कि उसका जीजा भी अचानक उत्पन्न हुई स्थिति, समस्या, परेशानी या चुनौती को किस नज़रिए से देखता है और उस पर एकाग्रचित होकर उससे निपटने और सुलझाने में कितना सक्षम या निपुण  है ।

19.    
कंगणा खेलना     :       इसके बाद सभी बाराती भंगड़ा करते हुए आराम कक्ष की ओर प्रस्थान करते हैं, जबिक थोड़ी ही देर बाद सालियां दूल्हे को कंगणा खेलने के लिये  आमंत्रित करने आती हैं ।  दूल्हा अपने चंद दोस्तों के साथ इस खेल के लिये जाता है।  इस खेल में अक्सर सबसे पहले जीजा अपनी सालियों को सात या फिर ग्यारह चाँदी के छल्ले भेंट करता है ।  फिर कंगणे के खेल के लिये एक बड़ी सी परात में पानी भर दिया जाता है, फिर उसमें इतना दूध मिलाया जाता है कि पानी की पारदर्शिता बिल्कुल समाप्त हो जाए ।  परात के एक तरफ दूल्हा और उसके पीछे उसकी हौंसला अफ़जाई के लिये उसके दोस्त खड़े होते हैं ।  परात की दूसरी तरफ दुल्हन बैठी होती है और उसके पीछे उसकी सखियों-सहेलियों और बहनों की पूरी पलटन होती हैं ।  पुराने ज़माने में चलने वाला छेद वाला एक पैसे का सिक्का या फिर एक कौड़ी को पानी में फेंक दिया जाता है जिसको दूल्हा व दुल्हन दोनों ढूंढने व एक-दूसरे से छीनने की कोशिश करते हैं ।  इस खेल में आमतौर पर रैफरी दुल्हन की बुआ, मौसी या उसकी चाची-ताई या फिर भाभी होती है।  यह खेल आमतौर पर पाँच पारियों में खेला जाता है और ऐसा माना जाता है कि पाँच पारियों में से दूल्हा या दुल्हन में से जो भी तीन बार जीत जाए, आने वाले पारिवारिक / गृहस्थ जीवन में प्रभुसत्ता उसी की ही चलेगी ।  दूल्हा हार जाए तो उसे सालियों के ताने और व्यंग्यबाण सहने व झेलने पड़ते हैं ।  लेकिन अगर गलती से दूल्हा जीत भी जाए, तो भी सालियों का जवाब नहीं, वह बड़ी होशियारी से दूल्हे से कहती हैं कि आप तो हमारे मेहमान हैं, इसलिए हमने आपको जीत जाने दिया ।

         
कंगणे के इस खेल से मुझे अपनी शादी की बात यादी आ गई ।  ये घटना जनवरी 1984 की है ,  मैं अपनी शादी में कंगणे के इस खेल में पहली चार पारियां जीत गया ।  मेरी जीत के बाद पत्नी का तो पता नहीं, क्योंकि उसने तो तब लम्बा सा घूंघट निकाला हुआ था, मगर मेरी सालियों के चेहरे देखेने लायक थे, वह हाथ जोड़ कर निवेदन कर रही थी कि कम-से-कम मैं पांचवीं पारी तो उनकी दीदी को जीतने दूँ । जब मेरी पत्नी की बुआ जी, जो कि हमारे इस खेल में रैफरी थी, ने पाँचवीं बार परात में पैसा फेंका, तो मैंने वह पैसा ढूंढने का प्रयास ही नहीं किया और जानबूझकर वह पारी अपनी पत्नी को जीत जाने दिया ।  सालियां तो आख़िर सालियां ही होती हैं ।  मेरी इस मेहरबानी के बावज़ूद भी वे बड़ी चतुराई से हंसते हुए और मुझे अंगूठा दिखाते हुए कहने लगी - "जीजा जी ! पूरी जीत तो उसकी ही होती है जो आखिरी पारी जीत जाए .......!"

20.    
विदाई या डोली   :       बारात की विदाई का वक्त मौसम के हिसाब से ही होता है ।  सर्दियों के दिनों यह रस्म शाम को चार बजे ही अदा कर दी जाती है जबकि गर्मियों में साढ़े पांच / छह बजे के बासपास विदाई की जाती है ।  दुल्हन पक्ष के ज्यादातर लोग खासतौर पर उसके  माता-पिता, भाई-बहन, सखियां व सहेलियां अश्रु भरी आंखों से दुल्हन को विदा करते हैं और भगवान से प्रार्थना करती हैं कि दुल्हन को उसके ससुराल में पूरी-पूरी इज्ज़त, मान-सम्मान व लाड़-प्यार मिले और वह हमेशा वहां सुख-सुविधा से रहे ।

21.    
पानी वारना या बहू का स्वागत  :       डोली जब ससुराल पहुंचती है तो वहां नव-विवाहित वर-वधू का खूब स्वागत होता है ।  गांव की औरतें दूल्हा-दुल्हन की खुशामद में गीत  गाती हैं, उनके सिठनियां देती हैं ।  अपने गीतों के माध्यम से ये औरते बताती हैं कि पहली दृष्टि में, देखने-परखने को ये नई जोड़ी कैसी लगती है ।  घर की दहलीज़ पर डोली पहुंचने पर दूल्हे की मां अपने बेटे व बहू के सिर के ऊपर से पानी (जिसमें थोड़ी दूध व चीनी भी मिली होती है) वार कर पांच बार पीती है और भगवान से उनकी लम्बी उम्र व उनके खुशहाल जीवन की दुआ मांगती हैं ।  गांव की व शादी में आई हुई बाकी सभी औरतें अपने गीतों के माध्यम से दूल्हे के माता-पिता को, उसके भाई-बहनों व उसके परिवार के अन्य सदस्यों को शादी की बधाई देती हैं और उनकी मंगल कामना करती हैं ।  इसके बाद दूल्हा-दुल्हन,  पहले  दायां पैर  बढ़ाकर घर में प्रवेश करते हैं ।

22.    
जठेरे पूजन और कंगण खोलना  :       दूसरे दिन सुबह नहा-धोकर चाय-नाश्ते से पहले एक ओर महत्त्वपूर्ण रिवाज़ निभाना होता है - "जठेरे पूजन" ,  अर्थात् घर के सभी बड़े लोगों को चरण स्पर्श करना और वर-वधू को परिवार के उन बुज़ुर्गों की पूजा करना जो कि अब इस दुनिया से रुक्सत हो  चुके हैं ।  यह रस्म घर से बाहर जाकर ही (दुल्हन पक्ष से आई चांर-पांच मेहमान महिलाओं की मौज़ूदगी में ही) पूरी की जाती है ।  एक थाली में आटे को दीया बनाकर सजाया जाता है उसमें देसी घी या सरसों का तेल डालकर रूई की बाती बनाई जाती है ।  शक्कर व देसी घी डालकर भुना हुआ आटा एक थाली में सजाया जाता है ।  यह मिश्रण एक तरह का प्रसाद होता है ।  जिस जगह पर जठेरों की पूरा की जानी होती है, पहले उसे अच्छी तरह साफ़ किया जाता है और वहां पर दूध के छींटे मारे जाते हैं ।  फिर थाली में देसी घी का एक दीया जलाकर घर के बड़े बुज़ुर्गों को याद किया जाता है और उनसे प्रार्थना व याचना की जाती है कि वे नवविवाहित जोड़ी को आशीर्वाद दें ताकि उनका जीवन खुशियों से भरा रहे और आगे चलकर इस नई दम्पत्ति पर किसी किस्म का कोई संकट न आए ।  अगर आए भी तो उस संकट से जूझने / सुलझाने के लिये नई जोड़ी को हिम्मत प्रदान करना ।  फिर, पहले दुल्हन दूल्हे का कंगना खोलती है, बाद में दूल्हा दुल्हन की कलाई में बंधा हुआ कंगना खोलता है ।  वहीं पर पूजा के बाद दुल्हन को कहा जाता है कि वे मुठ्ठियां भर-भर कर पांच बार प्रसाद अर्पित करे ।  अगर दुल्हन प्रसाद कम मात्रा में डाले तो महिलाएं इसका यह मतलब निकालती हैं कि बहू बड़ी समझदार व कम खर्चीली है, अगर घर में किसी प्रकार की कमी या अभाव आए भी तो वह अपनी समझदारी, बुद्धि व विवेक से निर्वाह  कर लेगी और भविष्य में कभी बुरा वक्त आने पर उसका सामना अपनी पूरी सूझबूझ से कर लेगी ।  लेकिन, अगर वह मुठ्ठियां भर-भर कर ज्यादा मात्रा में  प्रसाद अर्पित करती है तो इसका अर्थ यह निकाला जाता है कि बहू बहुत खर्चीली होगी और उसमें विपत्ति या किसी किस्म की परेशानी से जूझने की क्षमता उसमे  कम होगी ।  वह हालात पे नहीं, बल्कि हालात उसपे हावी हो जाएंगे ।

         इस तरह जठेरे पूजन के बाद सभी लोग घर वापस आ जाते हैं ।  पूजा के स्थान पर रखा हुआ प्रसाद व आटे का दिया इत्यादि, चिड़ियां-कौओं के खाने के लिये छोड़ दिया जाता है ।

 23.    
दुल्हन के माता-पिता का स्वागत   :       दोपहर होते-होते दुल्हन के माता-पिता, भाई-भाभी और दुल्हन के मायके से कुछ और मेहमान आ जाते हैं ।  दूल्हे के माता-पिता व गांव के चुनिन्दा सज्ज्न उनका स्वागत करते हैं ।  दूल्हा-दुल्हन के माता-पिता व बाकी मेहमान एक साथ बैठकर खाना खाते हैं और भगवान से प्रार्थना की जाती है कि इन दोनों परिवारों की आपसी प्रेम-भावना और मेल-मिलाप हमेशा बना रहे।  शाम को दुल्हन के माता-पिता व उनके साथ आए हुए बाकी सभी मेहमान अपने घर वापस चले जाते हैं ।

24.    
मधुर मिलन  :       इसके बाद शादी-विवाह में निभाए जाने वाले सभी प्रकार के रीति-रिवाज़ों की कड़ियों मे से बारी आती है आखिरी कड़ी या अंतिम रिवाज़ की, और वह है - "मधुर मिलन", जिसको कि हमारी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में "सुहाग रात" के नाम से कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है, और यह रस्म उसी रात को होती है ।  दूल्हा दुल्हन को  एक दूसरे से  मिलने-जुलने , एक-दूसरे को अच्छी तरह समझने-बूझने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाता है ताकि वे मिलजुलकर और एक दूसरे की भावनाओं व उम्मीदों का आदर-सत्कार सच्चे मन से करते हुए गृहस्थ धर्म को निभाएं और समय-समय पर अपने ऊपर आने वाले कर्त्तव्यों का पालन धर्म, लगन और सच्ची निष्ठा से करें, गृहस्थी की गाड़ी को आगे चलाएं, फलें-फूलें और परिवार को आगे बढ़ाने में पूरा-पूरा सहयोग दें और माता-पिता व घर के बुज़ुर्गों की उम्मीदों पर खरे उतरें ।
           

         वैसे तो पंजाब भौगौलिक दृष्टि से माँझा, मालवा व दोआबा नाम के तीन भागों में बंटा हुआ है और इन तीनों भागों में होने वाली शादियों के चंद एक रस्में  व रीति-रिवाज़, जाति-पांति, धर्म या मज़हब या इलाके के आधार पर थोड़े-बहुत भिन्न हो सकते हैं, मगर मोटे तौर पर सम्पूर्ण पंजाब में निभाए जाने वाले ज्यादातर रीति-रिवाज़ यही हैं, जिनको वहां के अधिकांश लोग दिल से मानते हैं और सामाजिक व धार्मिक स्तर पर निभाते भी हैं ।

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द्वारा :   आर.डी. भारद्वाज  "नूरपुरी", 
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