कानू सान्याल की मौत पर विशेष
कानू सान्याल और वर्तमान नक्सल विद्रोह की दिशा
प्रभात कुमार रॉय
कामरेड कानू सान्याल की आकस्मिक मौत की खबर ने चैंका
दिया। पुलिस का कहना है कि प्रथम दृश्टया उनकी मौत खुदकुशी प्रतीत होती है। जबकि
उनके दल के साथियों ने इसे आत्महत्या स्वीकार करने से इंकार कर दिया हैं। सच्चाई
कुछ भी हो एक ऐसा शख्स कानू सान्याल इस नश्वर संसार से प्रयाण कर गया,
जिसने कि अपने नेता और साथी चारु मजूमदार और जंगल संथाल के साथ मिलकर सन
1967
मे बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके में किसान विद्रोह की ऐसी चिंगारी सुलगाई दी थी, जोकि
वक़्त गुजरने के साथ एक भयंकर दावानल में तब्दील हो गई। अब तक जिसकी चपेट में भारत
के तकरीबन
250
जिले आ चुके हैं। विगत
43
वर्षो के दौरान यह नक्सल दावानल तकरीबन एक लाख से अधिक लोगों की जिंदगी लील चुकी
है। भारत के चैदह राज्यों में विस्तारित दंडकारण्य का लगभग संपूर्ण क्षेत्र नक्सल
हिंसा से आक्रांत है। जहां आजकल आपरेषन ग्रीनहंट संचालित किया जा रहा है,
जिसके तहत सुरक्षा बलों के एक लाख से अधिक जवान षिरकत कर
रहे हैं। विधि की विडंबना ही कहिए कि जिस नक्सल आंदोलन के कानू सान्याल प्रणेता रहे
उसी नक्सल संघर्ष के आतंकवादी तौर तरीकों के अंततः वह घोर आलोचक बन गए थे। यही कारण
रहा कि अपने ही शिष्यों के मध्य वह काफी कुछ अलग थलग से पड़ गए थे। कानू सान्याल की
बात सुनने समझने वाले बहुत कम लोग नक्सल पांतों में रह गए। राजनीतिक आइसोलेशन ने
उन्हें चिड़चिड़ा और बहुत बिमार बना दिया था किंतु वह देश की राजनीति को लेकर अत्यंत
सजग बने रहे और उस पर प्रायः अपने बेबाक कमेंटस पेश किया करते थे।
कानू सान्याल ने जोकि सन
60
के दशक के दौर में बंगाल के सिलीगुडी़ इलाके में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के
एक लीडर हुआ करते थे। अप्रैल
1967
में अपने नेता चारु मजूमदार के साथ मिलकर नक्सलबाड़ी के किसानों के आंदोलन की कयादत
करते हुए नेशनल सुर्खियों में आ गए,
जबकि
उनके नेतृत्व में किसानों का आंदोलन सशस्त्र बगावत में बदल गया। कामरेड लेनिन के
जन्म दिवस
22
अप्रैल
1968
को अपनी पार्टी को तोड़कर एक नई पार्टी के गठन का ऐलान कानू सान्याल ने कोलकता में
कर दिया। नवगठित पार्टी का नामकरण किया गया मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट
पार्टी। इस दौर में कानू सान्याल बंगाल के कालेज और विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत
नौजवानों के प्रबल आर्कशण केा केंद्र बन चुके थे। नक्सलबाड़ी की किसान बगावत ने
बंगाल के किसानों से कहीं अधिक बंगाल के युवाओं का प्रभावित किया,
जोकि एक हद तक वामपंथी आंदोलन के प्रभाव में पहले ही आ चुके थे। उस वक्त नक्सलबाड़ी
विद्रोह को अजय मुखर्जी की बंगाल सरकार ने कुचल दिया था जिसके गृहमंत्री ज्योति बसु
थे। कानू सान्याल और जंगल संथाल को गिरफ्तार कर लिया गया। नक्सल बगावत के
सैद्धांतिक पुरोधा चारु मजूमदार फरार हो गए। सन्
1968
में गिरफ्तार कानू सन्याल को
1977
में जेल से रिहा किया गया, जबकि ज्योति बसु के नेतृत्व में बंगाल में वामपंथी
हुकूमत सत्तानषीन हुई।
शुरुआती दौर में नक्सल विद्रोह की नेतृत्वकारी
पांतों में छात्र नेताओं का ही वर्चस्व रहा। असीम चटर्जी,
संतोष राणा,
अजीजुल हक़,
दिलीप मुखर्जी, शुचीतल रायचौधरी,
विनोद मिश्र,
जौहर प्रायः सभी नक्सल नेता छात्र आंदोलन के सरगना लीडर रह चुके थे। इसी कारण नक्सल
आंदोलन का केंद्र नक्सलबाड़ी बगावत के दमन के पष्चात कोलकता षहर बन गया। कोलकत्ता की
गलियों और सड़कों पर बंगाल पुलिस नक्सली छात्रों मध्य वर्शों तक खूनी झड़पों का
सिलसिला चलता रहा। जिसमे सैकड़ों की तादाद में पुलिस वाले और हजारों की संख्या में
नक्सल नौजवान मारे गए। इसी दौर में नक्सल विद्राह का एक अन्य केंद्र श्रीकाकाकुलम
इलाका आंध्रप्रदेश में विकसित हुआ, जहां वैम्पट सत्यनारायण,
तेजेश्वर राव और नागभूषण पटनायक इसके नेता बन कर उभरे।
इस नक्सल किसान विद्रोह को भी सैन्यशक्ति से कुचल दिया गया।
सन्
1972
में सिद्धार्थ शंकर राय की सरकार द्वारा कोलकत्ता में नक्सल आंदोलन को बेरहमी के
साथ कुचल डाला गया। षीर्श नक्सल नेता चारु मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया और
रहस्मय हालात में पुलिस कस्टडी में उनकी मृत्यु हो गई। इसके पष्चात पुलिस की पकड़ से
कुछ बचे हुए छात्र नेता जिनमें संतोष राणा,
कन्हाई चटर्जी,
विनोद मिश्र आदि बहुत से थे, बंगाल, बिहार और उड़ीसा के
देहाती इलाकों में भूमिगत हो गए। नक्सल बगावत को पूरी तरह से कदाचित कुचला नहीं जा
सका। इसने शनैः शनैः आंध्र प्रदेश के तेलगांना इलाके में अपने पांव पूरी तरह से जमा
लिए और बिहार और उड़ीसा में भी अपनी जड़े जमा ली।
सन्
1977
में कानू सान्याल ने अपनी रिहाई के तत्पश्चात अपने नेता चारु मजूमदार की वर्गशत्रु
के इंडिविजुअल ऐनिहीलीएशन
यानि कि व्यक्तिगत खात्मे की रणनीति को एकदम गलत करार देकर स्वयं को नक्सल आतंकवाद
से बुनियादी तौर पर अलग कर लिया। कानू सान्याल ने देश भर में दौरा करके विभिन्न
नक्सल गुटों के नेताओं को यह समझाने का जबरदस्त प्रयास किया, कि आतंकवादी तौर
तरीकों से किसान मजदूर कम्युनिस्ट क्रांति अंजाम नहीं दी जा सकती। इसके लिए पहले
व्यापक जनमानस में वर्गचेतना का प्रबल विस्तार अंजाम देना होगा। वह प्रायः कहा करते
थे कि कुछ क्रांतिकारी कितने ही महान् आत्म बलिदानी क्यों न हो,
वे
किसी राज्यसत्ता को उखाड़ कर नहीं फेंक सकते। राजसत्ता को उखाड़ कर किसी नई राजसत्ता
का निर्माण तभी मुमकिन हो सकता, जबकि करोड़ो किसान मजदूर क्रांतिकारियों की संगठित
पार्टी के नेतृत्व में उठ खड़े हो।
कानू सान्याल के मुसलसल कोशिश के बाद ही बिहार के
भोजपुरी क्षेत्र में सक्रिय विनोद मिश्र के नक्सल गुट ने आतंकवादी हिंसा संपूर्ण
परित्याग करके देश की मुख्यधारा में वापस लौट आने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। अपने
सारी जिंदगी कानू सान्याल ने कम्युनिस्ट राजनीति को समर्पित कर दी थी। वह हांलाकि
मध्यवर्ग में पैदा हुए और पले बढे़ थे। कुछ वर्षो तक कानू सान्याल सरकारी नौकरी में
भी रहे, किंतु साम्यवादी आदर्शों से गहन रुप से प्रेरित होकर उन्होने एक
क्रांतिकारी जीवन अपनाने का निर्णय ले लिया तो उसे जीवनपर्यन्त निभाया भी। वह बहुत
विरल सादगी के साथ गांव की एक छोटी सी झोपड़ी में रहे, जिसमे कि रात्रि में लालटेन
की रौशनी का उजियारा फैलता था। पहनने के नाम पर उनके पास कुछ फटे पुराने कपड़े रहा
करते थे। नक्सल संघर्श के वर्तमान आतंकवादी स्वरुप से वह बहुत असंतुष्ट और खिन्न थे
और इसे बदलने के लिए सदैव लालायित रहते थे। खासतौर से जब दिषाहीन नक्सल हिंसा कुछ
बेगुनाह इसानों की जान ले लिया करती तो उसकी खबरों को पढकर वह बहुत ही गहन दुख में
डूब जाते थे। कानू सान्याल वस्तुतः एक ऐसे जन नेता रहे जोकि अपने विचारों और जीवन
जीने के अंदाज के कारण बहुत तेजस्वी और प्रेरक रहा। जिसने भारत के नौजवानों की एक
पीढी को गहराई के साथ प्रभावित किया। देष के देहात में आजादी के पश्चात भी बाकायदा
कायम रहे सामंतवादी ढांचे को ध्वस्त करने में एक अहम भूमिका निर्वाह किया।
प्रभात कुमार रॉय
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी