क्या यूरोप से सबक लेगा भारतीय नेतृत्व ?

(प्रभात कुमार रॉय)

समूचे यूरोप का आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत तीव्रता के साथ परिवर्तित हो चुका है। घनघोर आर्थिक संकट की भयावह मारकाट कहें कि पूंजीवादी राजनीति का ऊंट ऐसी पलटी लेने पर मजबूर हो उठा कि सारा यूरोप हिल उठा है। यूरोप में ऐसी विकट राजनातिक उथल पुथल की अपेक्षा बाजारवादी पूँजीवाद के कुशल सिद्धांतकारों और पैरोकारों ने कदापि नहीं की होगी। घनघोर आर्थिक संकट से ग्रस्त राजनीतिक उथल-पुथल का एक जबरदस्त परिणाम हुआ कि समाजवादी फ्रैंचइस हालैंड फ्रांस के राष्ट्रपति चुनाव में फतेहयाब हो गए। यूरोप के गहन आर्थिक संकट का ही परिणाम है,  ग्रीस के आम चुनाव में राजनीतिक अनिश्चितता वाले परिणामों का सामने आए और जर्मनी के प्रांतीय चुनावों में एंजेला मर्केल की क्रिश्चियन डेमोट्स पार्टी को अत्यंत तगड़ा झटका लगा। वास्तव में ये परिणाम समस्त विश्व को क्या कोई संदेश देते प्रतीत नहीं होते? और विशेषकर भारत को यूरोप का प्रबल पैगाम है, जोकि यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर घोर आर्थिक मंदी के कगार पर खड़ा है। विश्व पूंजीवाद के सबसे बड़े गढ़ अमेरिका में बाजारपरस्त पूंजीवाद व्यवस्था के घोरतम विरोधी आक्यूपाई वॉलस्ट्रीट आंदोलन की आंधी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। जिन कटु तथ्यों की चर्चा अभी कुछ माह पू्र्व दबी जबान से राजसत्ता के गलियारों में की जाती रही कि आर्थिक मंदी के दौर से भारत भी बच नहीं सकेगा। आर्थिक मंदी के सभी तथ्य नग्न रुप में अब खुलकर राष्ट्र के समक्ष आ गए। जिस डीजीपी (आर्थिक विकास दर) की बढोत्तरी का मनमोहना हुकूमत बहुत डंका बजाती रही कि वह ग्यारह फीसदी तक पंहुच जाएगी। वो डीजीपी तो लुढक कर महज पांच फीसदी तक आ गई और आगामी वर्ष में इसके और अधिक लुढकने की संभावना व्यक्त की जाने लगी। राष्ट्र के औद्योगिक उत्पादन में पिछले दो वर्ष की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई और इसे भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के आग़ाज के तौर पर निरुपित किया गया। भारतीय रुपया डालर के मुकाबले में बेहद खस्ताहाल हो चला और शेयर बाजार में आ रही निरंतर गिरावट को इसके तात्कालिक असर के तौर पर देखा गया। यक़ीनन  मुद्रास्फीति रोकने के लिए मनमोहना हुकूमत द्वारा जो मौद्रिक नीतियां आजमाई गई, वे महज तुग़लकी साबित हुई। मार्च, 2010 के बाद ब्याज दरों में जो तेरह बार इज़ाफा किया, उसका भी नकारात्मक असर भी सामने आ गया। उद्योग जगत पहले से ही इसके नकारात्मक प्रभाव की आशंका जताते हुए ब्याज दरों की बढ़ोतरी का विरोध करता रहा। लेकिन सरकार के नीति-नियंताओं द्वारा मंझोले और छोटे उद्योगों की अनदेखी की गई। मुख्यतः औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में जो 5.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, वह खनन व विनिर्माण क्षेत्र में है, लेकिन अन्य इलाकों के हालात भी कमोबेश बेहतर नहीं हैं। भारत के वित्तमंत्री फरमाते हैं कि इस गिरावट पर दुनिया के बिगड़ते आर्थिक माहौल का असर है। लेकिन इसकी बुनियाद में बढ़ती महंगाई रोकने के लिए जो मौद्रिक उपाय किए गए उनका भी कितना अहम किरदार रहा ? मंहगाई रोकने के लिए दलालों, बिचौलियों और जमाखोरों पर हुकूमत ने कोई शकितशाली कानूनी प्रहार नहीं किया और वायदा कारोबार पर रोक तक आयद नहीं की गई। बिचौलियों और जमाखोरों को काबू करने के लिए खुदरा व्यापार में एफडीआई का खतरनाक प्रस्ताव लाया गया जोकि औधे मुँह गिर गया।

 

क्या कभी भारत का प्रभावी और पूंजीवाद की प्रबल पैरोकारी करने वाला शासकीय नेतृत्व कुछ सोचने समझने का कदाचित प्रयास करेगा और पूँजीवाद के वर्तमान पैटर्न पर पुनर्विचार करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएगा। अथवा शासकीय नेतृत्व फिर वास्तविक प्रभावों को गैरवाजिब कारणों के साथ जोड़कर नेपथ्य की ओर धकेलने की गलतियां दोहराता ही रहेगा ? आर्थिक हालात के लिए वस्तुतः मनमोहना हुकूमत की तुगलकी आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार क़रार दिया जाना चाहिए। तुगलकी आर्थिक नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद के असल अलंबरदार 80 करोड़ किसानों की निरंतर आपराधिक उपेक्षा अंजाम दी। भारतीय गणतंत्र की वास्तविक आत्मा देश के गांव-देहात और किसान-मजदूरों में ही सदैव निहित रही। भारत की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गाँव-देहात में निवास करती है। आजादी के दौर के 65 सालों के औद्यौगीकरण के बावजूद किसान अक़सरियत में विद्यमान रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन वाली आर्थिक नीतियों ने विगत 21 वर्षो में देश के किसानों की कमर ही तोड़कर रख दी। जो राष्ट्र खाद्यान्न के क्षेत्र में वर्षो से आत्मनिर्भर रहा, वह अब खाद्य सामग्री आयात करने के लिए मोहताज हो चला। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग तीस करोड़ नागरिकों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हो रहा। देश की क़यादत करने वाले आर्थिक नीति नियंताओं की प्राथमिकता में कदापि राष्ट्र के किसान-मजदूर और गाँव-देहात नहीं रहे। विगत दो दशकों से उनकी तव्वज़ों का मरक़ज बन चुका है, केवल और केवल कारपोरेट सैक्टर। देश के नीति नियंताओं की स्पष्ट आर्थिक दिशा रही कि कारपोरेट सैक्टर खूब तरक्की करेगा, तो स्वतः ही उसकी तरक्की टपक-टपक कर सभी गरीब भारतवासियों को निहाल कर जाएगी और उनकी गुरबत और बदहाली खुदबखुद ही मिट जाएगी।

कभी विश्व पर शासन करने वाला यूरोप पूंजीवाद के मार्ग पर चलकर बर्बाद और बदहाल हो चले। यूरोप के अनेक राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं दिवालिया हो चुकी हैं, जिनमें इटली और ग्रीस प्रमुख रुप से हैं और इंग्लैड भी आर्थिक तौर पर खस्ताहाल हो चुका है। भारत भी विगत 21 वर्षो से बाकायदा पूंजीवाद के बाजारपरस्त सिद्धांतों का अनुसरण कर रहा है। जिसका सीधा परिणाम आया कि मुठ्ठीभर कॉरपोरेट घराने और उनका प्रबंधक वर्ग अमीर से अमीरतर होते चले गए शेष भारत के किसान-मजदूर और मध्यवर्गीय नागरिक जन-गण मंहगाई और बेरोजगारी की त्रासद मार से तबाह और बरबाद होते गए। अभी भी समय शेष है कि भारतीय हुकूमत के नेतृत्व को पूंजीवादी यूरोप की आर्थिक तबाही से संजीदा सबक हासिल करना चाहिए। भारतीय समाज में भयावह आर्थिक असमानता  उत्पन्न करने और फिर उन्हे परवरिश प्रदान करने वाली आर्थिक कुनीतियों का तत्काल परित्याग करना चाहिए। भारतीय संविधान के समाजवादी सरोकारों से हुकूमत को प्रबल तौर पर संबद्ध करना चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गो में प्रकट हो चुकी भयानक आर्थिक विषमता को समाप्त करने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। कृषि और छोटे लघु उद्योगों के समुचिक विकास के लिए यथाशीघ्र पहल अंजाम देनी चाहिए। नौजवानों में व्याप्त विराट बेरोजगारी से निपटने के लिए युद्धस्तर पर शासकीय प्रयास किए जाने चाहिए। एकाधिकारवादी कॉरपोरेट सैक्टर को प्रदान की जा रहा शासकीय समर्थन और प्राथमिकताएं समाप्त की जानी चाहिए। यूरोप के बाजारपरस्त पूंजीवाद के तल्ख अनुभवों से यदि भारत की नेतृत्वकारी शक्तियों ने समुचित सबक नहीं सीखे तो भारत को भी आर्थिक बरबादी के रास्ते पर जाने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा।

(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)