17 अगस्त शहादत दिवस पर
अमर क्रांतिकारी मदन लाल धींगडा़
प्रभात कुमार रॉय
देश की
आजा़दी की खातिर अपना जीवन कुर्बान करने वाले अनेक महान् क्रांतिकारियों के
उल्लेख करने के विषय पर आधुनिक इतिहासकारों ने बेहद कंजूसी की है। मदनलाल धींगडा़
भी भारतवर्ष के उन तेजस्वी क्रांतिकारियों में एक रहे, जिनकी जीवन गाथा से भारत की
युवा पीढी़ कुछ कम ही परिचित है। 17 अगस्त सन् 1909 को फॉंसी के तख्ते पर जाने से
पहले, अपनी आखिरी ख्वाहिश प्रकट करते हुए उसने कहा कि मेरी इच्छा है कि अपनी
मातृभूमि के लिए फिर से जन्म लूं और पुन: स्वतंत्रता संग्राम में ही मारा जाऊं
तथा यह सिलसिला जब तक जारी रहे जब तक कि मेरा देश आज़ाद न हो जाए। मदनलाल धींगरा ने
अपनी शहादत से पहले चुनौती शीर्षक से अपना आखिरी बयान जारी किया। इस बयान में उसने
कहा कि प्रत्येक भारतीय के लिए एक चुनौती है कि वह यह भलीभांति सीख ले कि मौत का
वरण कैसे किया जाता है। समस्त शिक्षा दीक्षा तभी फलीभूत होगी, जबकि हम भारतवासी
अपने प्राणों की आहुति मातृभूमि पर चढा़ दें। मैं अपने प्राणों की आहूति अथवा अपने
जीवन का बलिदान इसीलिए दे रहा हूं कि मेरे शहीद होने से मेरे देश का मस्तक ऊंचा हो
जाएगा।
मदनलाल धी्गडा़ के बलिदान पर
जंग ए आज़ादी की योद्धा मैडम ऐनी बेसेंट ने कहा था कि आज के दौर को मदनलाल धींगडा़
जैसे शहीदों की और
वीर क्रांतिकारियों की बहुत आवश्यकता है। प्रख्यात क्रांतिकारी वीरेंद्रनाथ
चट्टोपाध्याय ने मदनलाल धींगडा़ की स्मृति में एक मासिक पत्रिका मदन तलवार के नाम
से शुरू की थी, जिसे मैडम भीखाजी कामा ने बर्लिन से बाकायदा प्रकाशित किया गया। यह
पत्रिका वर्षो तक विदेशों में सक्रिय क्रांतिकारियों की मुख्य पत्रिका बनी रही।
मदनलाल धींगडा़ की शहादत कदाचित व्यर्थ नहीं गई। उनकी शूरवीरता का आने वाले
इतिहास में निर्वाह करते हुए एवं उनसे जबरदस्त प्रेरणा लेते हुए पंजाब में सरदार
करतारसिंह सराबा सक्रिय हुए। उनके साथ मिलकर उत्तर भारत में रासबिहारी बोस ने
आजा़दी की जंग का परचम बुलंद रखा। रासबिहारी बोस की कयादत में वायसरॉय के काफिले पर
दिल्ली के चॉंदनी चौक में बम फेंका गया। बाद के दौर में रासबिहारी बोस ने आजा़द
हिंद फौ़ज़ के निमार्ण में सक्रिय किरदार निभाया और अंन्तोगत्वा उसकी कमान नेताजी
सुभाषचंद्र बोस को सौंप दी। मदनलाल धींगडा़ से बेहद प्रभावित क्रांतिकारी करतारसिंह
सराबा को प्रथम लाहौर कांसपिरेसी केस में सजा ए मौत दे दी गई। करतारसिंह सराबा
शहादत से प्रेरित होकर भगतसिंह और उसके साथियों ने संपूर्ण भारत में ब्रिटिश राज को
हिलाकर रख दिया। इतने सारे भारतीय क्रांतिकारियों को प्रभावित करने वाले मदनलाल
धींगडा़ को इतिहास की निर्मम उपेक्षा का शिकार होना पडा़ है। अमृतसर शहर में सन्
1987 में जन्म लेने वाले इस अद्भुत वीर क्रांतिकारी ने मात्र 20 वर्ष की जिंदगी जी
किंतु इतने अल्प जीवनकाल में उसने इतनी तेजस्विता का परिचय दिया कि उसकी मौत के
बाद आने वाला समस्त क्रांतिकारी दौर उसके बलिदान और विचारों से बेहद मुत्तासिर
हुआ। मदनलाल धींगडा़ का अपना स्वयं का परिवार एकदम ब्रिटिश राज का हिमायती परिवार
था। मदनलाल धींगडा़ के के पिता राय साहब दित्तामल अंग्रेजी राज के द्वारा
रायबहादुर की उपाधि से नवाजे गए। वह पंजाब सिविल सर्विस में एक बडे़ ओहदे पर तैनात
थे। मदनलाल की मॉं अवश्य ही धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत महिला थी। अपनी मॉं के
विचारों का असर बालक मदनलाल पर बहुत अधिक हुआ। एक बेहद द्वंदमय पारिवारिक परिवेश
में मदनलाल का पालन पोषण हुआ। अमृतसर के मिशन स्कूल में प्राथमिक शिक्षा दीक्षा
उसके पश्चात गर्वन्मेंट कालिज अमृतसर में दाखिल हुए। यही पर कुछ क्रांतकारियों
के संपर्क में आए और पत्राचार के माध्यम से विनायक दामोदर सावरकर से परिचय हुआ।
बाद में दोनों क्रांतिकारियों की मुलाकात इंग्लैड में हुई, जहां वे उच्च शिक्षा
हासिल करने पंहुचे थे। सन् 1906 में इंग्लैंड में मदनलाल धींगडा़ ने लंदन के
इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश लिया। 1906 में ही विनायक दामादर सावरकर भी लंदन
पंहुचे थे। सावरकार की कयादत में सभी भारतीय देशभक्त विद्यार्थी गण लंदन के इंडिया
हाउस में एकत्र होने लगे। बेहद खुशदिल और अलमस्त स्वभाव के मदनलाल धींगडा़ ने
अत्यंत गहन गंभीर आदत के सावरकर को अपना अग्रणी नेता स्वीकार किया। सन् 1907 में
भारतीय विद्यार्थियों ने इंडिया हाउस में 1857 के स्वातंत्रय संग्राम की 50 वीं
वर्षगॉंठ मनाने का ऐलान किया। इस अवसर बहुत से सारे विद्यार्थियों ने सावरकर के
नेतृत्व में स्वातंत्रय संग्राम को बाकायदा जारी रखने का संकल्प लिया। इनमें
मदनलाल धींगडां सदैव ही अग्रणी रहा।
लंदन में भारतीय विद्यार्थियों की
क्रांतिकारी गतिविधियों की निगरानी का काम सर कर्जन वाइली अंजाम दिया करता था।
क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक सावरकर कर्जन वाइली को अपना अहम
दुश्मन समझते थे। सर कर्जन वाइली को कत्ल करने की जिम्मेदारी मदनलाल धी्गडा़ को
सौंपी गई। 2 जुलाई को 1909 को कर्जन वाइली का इंस्टीट्यूट आफ इंपीरियल स्ट्डीज के
जंहागीर हाउस में अभिनंदन समारोह होना तय हुआ था। इसी अवसर पर पूर्व निर्मित योजना
पर अमल करते हुए मदनलाल धींगडा़ ने अपने बेल्ज्यिन रिवालवर से कर्जन वाइली को पांच
गोलियां मार कर, उसे वहीं ढेर कर दिया।
मदनलाल धींगडा़ ने मौक ए वारदात से भागने का किंचित प्रयास नहीं किया।
गिरफ्तारी के पश्चात उस पर मुकदमा चला, किंतु मदनलाल ने अपने बचाव के लिए कोई वकील
नहीं किया। मदनलाल धीगडा़ ने अपना बयान ब्रिटिश अदालत में चुनौती शीर्षक के तहत पेश
किया। मदनलाल धीगडा़ के मुकदमे का फैसला केवल 20 मिनट में ही हो गया था। उसे फॉंसी
की सजा सुनाई गई और फॉंसी की तारीख 17 अगस्त 1909 तय की गई।
17 अगस्त 1909 को लंदन की
पेंटोनविले जेल में मदनलाल धींगडा़ को फॉंसी दे दी गई। 16 अगस्त 1909 को विनायक
सावरकर और उनके मुठ्ठीभर साथियों ने एक ऐतिहासिक पर्चा प्रकाशित करावाया और उसे
रातभर लंदन की सडकों पर वितरित किया गया। इसमे लिख गया था कि आज 17 अगस्त 1909 है।
आज का दिवस प्रत्येक भारतवासी के दिलो दिमाग पर रक्त से अंकित किया जाना चाहिए।
आज हमारे दोस्त और महान् क्रांतिकारी मदनलाल धींगडा़ को पेंटोनविले जेल में फॉंसी
दे दी जाएगी। मदनलाल धींगडा़ का नाम सदैव आदरपूर्वक लिया जाएगा और इतिहास में
स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उसका बलिदान क्रांतिकारी संघर्ष का पथ प्रर्दशन
करेगा। अंग्रेज हमारे स्वातंत्रय संग्राम को कभी कुचल नहीं सकेगें।
प्रभात कुमार रॉय