पाक राजसत्ता का विनाशकारी अंतरद्वंद

(प्रभात कुमार रॉय)

पाक़िस्तान की तक़दीर में अपने निर्माण के वक्त से ही जनतंत्र और सैन्य तानाशाही के मध्य निरंतर हिचखोले लेते हुए झूलना लिखा है। पाक़िस्तान में राजसत्ता का पैंडुलम कभी जनतंत्र की ओर झूलता नजर आता है तो कभी सैन्य तानाशाही की ओर जाता दिखता है। मूलतः सामंती चरित्र के पाक़िस्तान में जब कभी जनतंत्र के अंकुर फूटकर पल्लवित होने लगते हैं, तो उन पर कोई ना कोई प्रबल कुठाराघात हो जाता है। पाक़िस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली का रावल पिंडी की जनसभा में कत्ल कर दिया गया। उनके बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री कुछ ही वक्त सत्ता में रह सके और जनरल सिकंदर मिर्जा ने जनतंत्रिक हुकूमत का तख्तापलट कर दिया। कामयाब पाक़ प्रधानमंत्री रहे जुल्फीकारअली भुट्टो को जनरल जिया और न्यायपालिका ने मिलकर फाँसी पर लटका दिया। नवाज़ शरीफ़ का जनरल मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया। जनतंत्र का पुनः आग़ाज होते ही बेनजीर कत्ल कर दिया गया। सैन्य तख्तापलट के लिए बेहद कुख्यात रहे, पाकिस्तान में इस बार सुप्रीमकोर्ट द्वारा जनतांत्रिक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को बाकायदा न्यायिक कुर्बानी प्रदान की गई।

 

सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला मुस्तक़बिल में एक और सैन्य तख्तापलट की सशक्त पृष्ठभूमि निर्मित कर सकता है। यदि ऐसा मुमकिन हुआ, तो यह अतीत के सभी  ऐतिहासिक तख्तापलट से विलग सिद्ध होगा। पाक़िस्तान में अभी तक जब कभी सैन्य तख्तापलट हुआ, उस वक्त राजनीतिक दल आपस में गुथ्थम-गुथ्था हो रहे थे। लेकिन इस बार सुप्रीमकोर्ट और हुकूमत के मध्य जबरदस्त जंग छिड़ी है। पाक प्रधानमंत्री गिलानी की ऐतिहासिक न्यायिक कुर्बानी मुल्क में एक नए राजनीतिक संकट के आग़ाज का सबब बन चुकी है। सुप्रीमकोर्ट के निर्देश के बावजूद गिलानी ने राष्ट्रपति जरदारी के विरुद्ध  भ्रष्टाचार और मनी लांड्रिंग के संगीन इल्जामात की तहक़ीकात करने से इनकार कर दिया। एक कुटिल राजनीतिक सौदेबाजी के तहत जनरल मुशर्रफ द्वारा बेनजीर और जरदारी के भ्रष्टाचार पर पर्दादारी कायम रखने की जो कवायद अंजाम दी गई, गिलानी साहब उस पर्दादारी को बाकायदा बरक़रार बनाए रखने की जिद पर अड़े रहे। जबकि सुप्रीमकोर्ट ने मुशर्रफ की समस्त कुटिल कारगुजारी को गैरकानूनी क़रार देकर रद्द क़रार दिया। क्योंकि सुप्रीमकोर्ट के निशाने पर राष्ट्रपति जरदारी रहे हैं, अतः गिलानी की कुर्बानी से यह अंतरद्वंद समाप्त नहीं होने वाला। सत्तानशीन पाक़िस्तान पीपुल्स पार्टी ने सुप्रीमकोर्ट की हिक़ायात मानने का वायदा किया, इसलिए नए प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के समक्ष अपनी पार्टी के राष्ट्रपति के विरुद्ध तहक़ीकात अंजाम देने की प्रबल चुनौती पेश होगी।

 

पाक़िस्तान अनेक आंतरिक जटिल समस्याओं के अतिरिक्त अपने आक़ा अमेरिका के साथ बदतर रिश्तों के संकटग्रस्त दौर से गुज़र रहा है।  हुकूमत के समक्ष बेहद जटिल दुश्वारी पेश हो गई, क्योंकि इस वक्त सुप्रीम कोर्ट और सेना एकजुट प्रतीत होती है। इन वाक़यात के पश्चात पाकिस्तान में शीघ्र चुनाव होने के अतिरिक्त राजनीतिक समीकरण के भी परिवर्तित हो जाने की प्रबल संभावना है। पाक-राजनीति के विशेषज्ञों का मत है कि इस वक्त सुप्रीम कोर्ट और सेना के मध्य अंदरखाने तालमेल अवश्य चल रहा है। यह ज्वलंत तथ्य रहा कि कुछ वर्ष पूर्व ही सेना और सुप्रीम कोर्ट एक-दूसरे के बरखिलाफ खम ठोंककर खड़े थे। परवेज मुशर्रफ को राजसत्ता से बेदख़ल करने में सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी का अहम क़िरदार रहा। उल्लेखनीय है कि सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को भी मुशर्रफ ने ही हटाया था। निरंतर बदलते हुए घटनाक्रम में एक तरफ सुप्रीम कोर्ट और सेना मुस्तैद है, तो दूसरी तरफ देश के राजनीतिक दल खड़े हैं।  

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने भले ही प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अयोग्य क़रार दे दिया, किंतु सुप्रीम कोर्ट का वास्तविक निशाना तो राष्ट्रपति जरदारी पर लगा है। पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक हुकूमत के संचालन में प्रधानमंत्री की भूमिका बहुत अधिक अहम नहीं रहती। पाकिस्तान के संविधान के तहत प्रधानमंत्री के मुकाबिल राष्ट्रपति का ओहदा कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। भारत के राष्ट्रपति से एकदम विलग पाक-राष्ट्रपति रोजमर्रा की राजनीति में भी बाकायदा दख़ल रखता है। सुप्रीमकोर्ट वर्तमान प्रधानमंत्री पर भी राष्ट्रपति जरदारी के विरुद्ध कार्रवाई अंजाम देने के लिए यक़ीनन कानूनी दबाव बनाएगा। ऐसा होने पर पाक-प्रधानमंत्री फिर क्या रुख अख्तियार करेगा? अगर उसने जरदारी के खिलाफ कार्रवाई अंजाम नहीं दी, तो क्या फिर राजा परवेज़ अशरफ़ को भी सुप्रीम कोर्ट अयोग्य क़रार देगा? अगर ऐसा होगा , तो क्या देश में नए चुनाव के लिए हालात निर्मित होगें अथवा अराजकतापूर्ण राजनीतिक हालात के तहत सैन्य तख्ता पलट हो जाएगा?

 

मौजूदा परिस्थिति में पाक़िस्तान के अंदरूनी हालात के बद से बदतर होने की प्रबल आशंका है। राजनीतिक अस्थिरता के जारी रहते हुए पाक़ हुकूमत द्वारा नीतिगत फैसले नहीं लिए जा रहे। गिलानी की अयोग्यता वस्तुतः 26 अप्रैल 2012 से प्रभावी हुई, अतः उनकी हुकूमत द्वारा पारित बजट भी निरस्त हो जाएगा। सर्वविदित है कि पाकिस्तान के आर्थिक हालत काफी खस्ता है। पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर बमुश्किल दो फीसदी पर सिमट गई, अब नया संकट उसको शून्य विकास दर की दुश्वारी पर धकेल सकता है। पाक़िस्तान के संपूर्ण परिस्थिति को यदि अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की दृष्टि से देखें, तो दुनिया का कोई भी मुल्क उस पर यक़ीन और भरोसा करने के लिए तत्पर नहीं। वह तक़रीबन ऐसा कोई मुल्क बन चुका है, जहां आम पाक़िस्तानी बेहद संकटग्रस्त है और मुल्क के हुक्मरानों के व्यवहार में इसकी कतई कोई फिक्र प्रतीत नहीं होती। राजनीतिक अस्थिरता के अतिरिक्त पाक़िस्तान के अनेक शहरों में कानून-व्यवस्था के हालात बद से बदतर होते चले गए। कराची जैसे शहर की स्थिति तो अत्याधिक खराब है। आतंकवाद के अलावा अनेक अपराधी गैंग सक्रिय हैं, जिनके मध्य आए दिन की गैंगवार जारी है। इसके अतिरिक्त पाक़िस्तान अनेक भयानक दुश्वारियों और संकटों से बुरी तरह जूझ रहा है। कुदरत की जरख़ेज इनायतों से सरसब्ज़ होने के बावजूद खाद्यानों और बिजली का उत्पादन नहीं बढ़ रहा। जो लोग अमीर और सक्षम हैं वे प्रायः दुबई, लंदन अथवा दुनिया के अन्य शहरों में बस जाने के लिए पाकिस्तान का परित्याग कर रहे हैं। जो गरीब, बेबस और लाचार हैं, वे पाकिस्तान में जीने के लिए अभिशप्त रहे हैं। कोई भी ऐसी सियासी शख्सियत नज़र नहीं आती, जो निस्वार्थ होकर संकटग्रस्त मुल्क को दुश्वारियों से बाहर निकालने का संजीदा प्रयास अंजाम दे।

 

पाक़िस्तान के दुष्कर हालात में हिज़बुल और लश्कर-ए-तैयबा जैसे प्रतिगामी ज़ेहादी तत्वों की ताक़त में इज़ाफा होना लाजमी है। क्या वस्तुतः पाकिस्तान अब दूसरा अफ़गानिस्तान बन जाने के क़गार पर खड़ा है ? यह स्थिति भारत के लिए सबसे अधिक तशवीशनाक़ सिद्ध होने वाली है। भारत सीधे तौर पर अफ़गान आतंकवाद की चपेट में अभी तक नहीं आया, क्योंकि पाकिस्तान मध्य में विद्यमान रहा। अब यदि पाकिस्तान स्वयं ही अफ़गान आतंकवाद की चपेट में आ गये, तो भारत के लिए दोहरी ज़ेहादी चुनौतियां विकराल रुप धारण कर लेगीं। एक तरफ ज़ेहादी तत्व भारत पर भयावह तौर पर हमलावर होगें और दूसरी तरफ पाक़िस्तान के उदारवादी भारत में पनाह की गुज़ारिश करेगें। दोनों ही स्थितियां हमारे लिए तशवीशनाक़ साबित होगीं। भारत और पाकिस्तान के मध्य ताल्लुकात सुधारने की कोशिश तो बाकायदा अंजाम दी जा रही है, लेकिन जटिल यक्षप्रश्न है कि जिस ताक़त से हुकमत-ए-हिंद बातचीत करके ताल्लुकात सुधारने की क़वायद अंजाम दे रही है, क्या वास्तव में उसके ही हाथों में पाक़िस्तान की वास्तविक राजसत्ता निहित है? अत्यंत मुश्किल हो  रहा है यह समझ सकना कि वहां की राजसत्ता में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सर्वोच्च हैं अथवा सेना सर्वोच्च है याकि सुप्रीम कोर्ट । कूटनीतिक बातचीत अंजाम दे, तो आखिर किसके साथ ? पाक़िस्तान की राजसत्ता के प्रमुख स्तभों के मध्य जारी आपसी अंतरद्वंद, कहीं उसे संपूर्ण विनाश की ओर ही न धकेल दे।

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजरी कॉऊंसिल)