नए साल का आगमन वस्तुतः नई उम्मीदों का वक्त होता है, राष्ट्र की समस्याएं कितनी भी
विकराल, गंभीर और जटिल क्यों न हों,
किंतु यह वक्त उम्मीदों और उमंगों से सराबोर माहौल में उनके समुचित समाधान पर विचार
करने का बाजिब वक्त होता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंजाम दी गई
गलतियों से सबक सीखने का वक्त होता है, ताकि संपूर्ण वर्ष बेहतर कोशिशें अंजाम दी
जा सकें। यह गौरतलब है कि प्रत्येक नया साल उत्तरोत्तर कड़ी चुनौतियां लेकर सामने
आता है। इस प्रारूप में
2013
के परिप्रेक्ष्य में कुछ विशिष्ट बिंदुओं पर विचार आवश्यक है,
क्योंकि अब तक कुछ समस्याएं इस हद तक पहुंच चुकी हैं कि राष्ट्र का जनमानस इनके
निवारण के लिए और अपना और अधिक धैर्य कायम नहीं रख सकता। राष्ट्र के लिए सबसे अहम
कानून और न्याय व्यवस्था की विकराल समस्या पर 2012 का वर्ष समाप्त होते होते शासक
वर्ग को नौजवानों की तरफ से प्रबल चुनौती देते हुए अलविदा कह गया। 2012 का वर्ष
सफेदपोश राजनेताओं द्वारा अंजाम दी गई राजकोष की भीषण लूटमार का कंपोटर एंड ऑडिटर
जनरल (कैग) द्वारा पर्दाफाश करने लिए भी जाना जाएगा। जबकि 2जी स्पैक्ट्रम स्कैंडल
केस के तहत कैग द्वारा पर्दाफाश की गई एक लाख छियत्तर करोड़ की लूट को पीछे छोड़ते
हुए आबंटन स्कैंडल के तहत एक लाख छियासी हजार करोड़ की राजकोषिय लूट का नया रिकार्ड
कायम किया गया। एक लाख छियासी हजार करोड़ लूट के कोलब्लाक स्कैंडल के विशिष्ट
किरदार के तौर पर ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बने रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम
कैग की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आया। कोलब्लाक स्कैंडल पर संसद की
कार्यवाही अनेक दिनों तक बाधित बनी रही। इसके अतिरिक्त कंपोटर एंड ऑडिटर जनरल (कै)
विनोद राय द्वारा अनेक शासकीय स्कैंडल प्रकाश में लाए गए, जिसमें विमानन मंत्रालय
का स्कैंडल सबसे अधिक विशिष्ट रहा। भीषण भ्रष्टाचार के प्रश्न पर उभरा अन्ना आंदोलन
शीर्ष नेतृत्व की आपसी रस्साकशी और मतभेदों में बेहद निर्बल हो गया। राजनीतिक
पार्टी तशकील करने की जल्दबाजी अंजाम देने के उपक्रम में अरविंद केजरीवाल जनआंदोलन
के हाशिए पर सिमटकर रह गए।
दिल्ली के जघन्य बालात्कार के तत्पश्चात उभरे विराट नौजवान-विद्यार्थी आंदोलन ने
फिर एक बार सत्तामद से सराबोर शासक वर्ग के राजनेताओं के वास्तविक चरित्र को बेनकाब
करके रख दिया है, जबकि वोटों के लिए आम लोगों के समक्ष गिड़गिड़ाने वाले राजनेताओं
को विद्यार्थियों और नौजवान से सीधे मुलाकात और बातचीत करने में तो गुरेज बना रहा,
किंतु उनके द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने, पानी की बौछारें बरसाने और
आँसू गैस के गोले पटकने में कोई कोताही नहीं की गई। स्वस्फूर्तः जनआंदोलनों को ठीक
तरह से नहीं समझ सकने वाली सत्तानशीन काँग्रेस पार्टी 1973 में गुजरात के अहमदाबाद
शहर से उभरे नवनिर्माण समिति के विद्यार्थी-नौजवान आंदोलन को भी विस्मृत कर बैठी
है, जिसने अंततः जेपी आंदोलन का विराट रुप धारण करके इंदिरा हुकूमत को खाक में मिला
दिया था। अभी वक्त शेष है कि शासकवर्ग के राजनेताओं को कानून और न्याय व्यवस्था के
विकराल प्रश्न पर उभरे प्रबल जनआक्रोश को अच्छी तरह समझकर यथाशीघ्र कड़े कदम उठाने
चाहिए। समूचा देश अब बड़े-बड़े सफेदपोश अपराधियों और जघन्य अपराधियों के लिए त्वरित
तौर पर सख्त से सख्त सजा चाहता है।
समतावादी परिवर्तन को पुरजोर गति प्रदान करने व न्यायसंगत व्यवस्था को बाकायदा कायम
करने की खातिर इस वर्ष 2013 को अहम चुनौती के तौर पर तसलीम किया जाना चाहिए। भारत
की समस्त औद्योगिक और वैज्ञानिक तरक्की हो जाने के बावजूद, आज भी भारत की आधी से
अधिक आबादी की बुनियादी जरूरतें पूरा नहीं की जा सकी हैं। करोड़ों लोग भयंकर रूप से
भूख,
कुपोषण और विकट अभावों में किसी तरह से जिंदा बने रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि
अधिसंख्य लोगों की सोच परिवर्तित किए बिना और समतावादी जीवन पद्धति के तहत बुनियादी
परिवर्तन का आगाज किए बिना समतावादी नीतियां को यदि महज सत्ता शिखर से थोप दिया
जाएं तो इस तरह के इकदामात से सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में टिकाऊ व स्थायी परिवर्तन
नहीं लाया जा सकता। कथित आर्थिक ग्लोब्लाइजेशन के आगाज के पश्चात भारत की सरजमीं पर
दो अरबपतियों से बढ़कर छप्पन लोग अरबपति बन चुके हैं, किंतु गरीबी की सरहद के नीचे
कलपते-सिसकते हुए जिंदा बने रहने वाले भारतीय लोगों की तादाद भी 40 करोड़ से बढकर
50 करोड़ हो चुकी है। राष्ट्र के करोड़ों किसान अत्यंत हताश-निराश है, यहाँ तक कि
लाखों की तादाद में आत्मघात पर उतारु रहे हैं। करोड़ों नौजवान बेरोजगारी से अभिशप्त
और त्रस्त रहे हैं, अतः इनके गहन निराशा काल में दिशाहीन होकर भटक जाने की प्रबल
संभावना प्रायः बनी रहती है। आदर्शविहीन और संस्कारहीन शिक्षा पद्धति ने राष्ट्र के
नौजवानों को दिगभ्रमित करने में कहीं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। नव-पूंजीवाद के
विशाक्त सामाजिक-आर्थिक वातावरण ने धन दौलत की लिप्सा को लुटेरी राक्षसी मनोवृति तक
पंहुचा दिया है। इन सभी अधोपतित भौतिक और मानसिक हालात को परिवर्तित करने की पुरजोर
कोशिश और एक समतावादी, देशभक्ति से सराबोर एवं विकासशील वातावरण को तशकील करने की
प्रबल पहल 2013 में होनी ही चाहिए। भीषण भ्रष्ट्राचार और जघन्य अपराधों के बरखिलाफ
प्रजव्लित जनआंदोलन की मशाल की अग्निमय शिखा को सामाजिक-राजनीतिक तौर पर और अधिक
तेजतर करने की जबरदस्त दरकार है, जिसकी शानदार, प्रखर और तेजस्वी रौशनी में समूचा
राष्ट्रीय अंधकार पिघलकर तिरोहित हो जाए।
जलवायु बदलाव की समस्या वस्तुतः ऐसी गंभीर और जटिल समस्या है, जिसके कारण भारत धरती
की जीवनदायिनी क्षमता के लिए ही खतरा उत्पन्न हो गया है।
भारत की गंगा, जमुना एवं अन्य नदियां गहन-गंभीर खतरे में है।
यह घनघोर आश्चर्य और गहन दुखद बात है कि वैज्ञानिकों द्वारा बार-बार चेतावनी देने
के बावजूद ऐसी कोई निर्णायक पहल अब तक नहीं हुई है और न ही इसके अनुकूल राष्ट्र में
वातावरण निर्मित हो पाया है। पूंजीवादी विकास की गति को तेजकर करने के लिए धातु
खदानों से परिपूरिपूर्ण जंगलों से करोड़ों आदिवासियों के दरबदर करके दुर्दान्त
नक्सलपंथ को वस्तुतः शासक वर्ग की नीतियों ने विस्तारित किया है कि वह नक्सलपंथ 20
प्रांतों के ढाई हजार थाना क्षेत्रों में कहर ढा रहा है। समुचित और संतुलित विकास
के लिए बाजारपरस्त-पूंजीवादी मानसिकता को अलविदा कहना ही होगा तथा इस एक तरफा विकास
के लिए जल, जंगल और जमीन को तहस-नहस करने की कदाचित जरुरत नहीं है, वरन् राष्ट्र के
कल्याण हेतु इन सबकी प्रबल हिफाजत की महती आवश्यकता है। दूसरी ओर यदि बहुत व्यापक
जन-अभियानों व जनआंदोलनों से समतावादी नीतियों के साथ समतावादी सोच-विचार को जनमानस
में फैलाने का जोरदार प्रयास किया जाएगा तो समता के साथ-साथ परम सादगी के
सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को व्यापक स्तर पर अपनाया जा सकेगा। जरूरत केवल आर्थिक
विषमता दूर करने की नहीं रही है, अपितु जातीवादी सामाजिक विषमता को समाप्त करने की
भी रही है। विशेषकर स्त्री पुरुष के मध्य लिंग पर आधारित भेदभाव दूर करना भी अत्यंत
आवश्यक है। सांप्रदायिकता का कैंसर देश में अपना जहर फिर से न फैला सके, इसके लिए
जोरदार मनोवैज्ञानिक संग्राम की आवश्यकता बनी रही है। प्रत्येक किस्म की
सांप्रदायिकता से कड़ा लोहा समतावादी देशभक्तों को लेना होगा। जेहादियों से लेकर
बजरंगियों तक राष्ट्र को सांप्रदायिक तौर पर विभाजित करने में सदैव जुटे रहने वाले
सभी विघटनकारियों को बिना किसी संकोच और संशय के परास्त किए बिना सशक्त एकजुट भारत
का निर्माण कदापि नहीं किया जा सकेगा। न्यायसंगत ढंग से सभी नागरिकों की जरूरतों को
पूरा करने और साथ में पर्यावरण रक्षा की मुख्य जिम्मेदारियों को साथ-साथ निभाया जा
सकेगा। यदि भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की तो इससे एशिया के अन्य देश
प्रेरित होंगे। इस राह पर संकल्प के साथ आगे बढ़ना भारतवासियों लिए नए वर्ष की सबसे
बड़ी चुनौती है।
(समाप्त)