क्रांतिकारियों के तसव्‍वुर का भारत

प्रभात कुमार रॉय

देश की आजादी के लिए लाखों भारतवासियों ने अपना जीवन बलिदान किया। हजारों क्रांतिकारी हँसते खिलखिलाते  हुए फॉंसी के फंदों पर झूल गए। 1857 से बाकायदा प्रारम्‍भ हुआ स्‍वातंत्रय संग्राम 1947 में जाकर खत्‍म हुआ। असल सवाल यह है कि क्‍या आजादी के दौर के 63 वर्षो व्‍यतीत हो जाने के पश्‍चात भी हम वास्‍तव में एक ऐसे आजा़द हिंदुस्‍तान को निमार्ण कर पाए हैं, जिसका स्‍वपन देश की खातिर बेमिसाल बलिदान देते हुए आजादी के दिवानों ने अपनी ऑंखों में संजोया था। आजादी के दिवानों द्वारा सुनिश्चित उस महान् मकसद को हासिल करने की खातिर हम कितना कुछ कर पाए। वास्‍तव में सन् 1857 से प्रारम्‍भ हुआ भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम 90 वर्षो तक जारी असीम बलिदानों के बल पर 1947 में एक खंडित आजादी लेकर कामयाब हुआ।

 

 साम्राज्‍यवादी साजिश और मुस्लिम लीग के धर्मान्‍ध रूख ने वतन की आजादी को लाखों बेगुनाह लोगों के लहू से दाग़दार कर दिया और करोडों नागरिकों को दरबदर कर दिया। इस सब के बावजूद भी यही राग अलापा जाता रहा कि आजादी अहिंसा के अद्भभुत अपूर्व प्रयोग के बल पर हासिल हो गई। दुर्भाग्‍य से आज तक भी देश के बच्‍चों का यही सबक सिखाया जा रहा है कि दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल। इससे बडा़ ऐतिहासिक झूठ भी किसी देश ने न तो बोला होगा नाही कदाचित सुना होगा, जैसा कि विगत 63 वर्षो से हमारा देश कहता और सुनता आया है। क्‍या अहिंसा का राग अलापना उन तीन लाख भारतीयों का अपमान नहीं हैं, जिन्‍होने 1857 के सशस्‍त्र संग्राम के माध्‍यम से पहली बार जातपांत, मज़हब और इलाके के संकीर्ण दायरों से उपर उठकर जबरदस्‍त तौर पर अपना जीवन बलिदान कर दिया। क्‍या इस नाका़म प्रथम स्‍वातंत्रय संग्राम के पश्‍चात गदर पार्टी, हिंदुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन और 1942 की अगस्‍त क्रांति और सुभाषचंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के तमाम सशस्‍त्र संघर्ष के प्रयासों को असंख्‍य बलिदानों को आधिकारिक तौर पर निरंतर नकारा नहीं जा रहा है। सबसे पहले इस मिथक का भंडाफोड़ होना चाहिए कि देश को आजा़दी सिर्फ अहिंसक प्रयासों से  हासिल हुई। महात्‍मा गॉंधी की अहिंसक रणनीति ने यक़ीनन 1921 के पश्‍चात देश में अभूतपूर्व जागरण अवश्‍य ही उत्‍पन्‍न किया, देश आम नागरिकों को विशेषकर बिहार के चंपारण सत्‍याग्रह से देश के करोडों किसानों को आजादी की जंग में बाकायदा सक्रिय शिरक़त करने के गहन तौर पर प्रेरित भी किया, किंतु वही तो सब कुछ और समग्र संग्राम नहीं था। इंडियन नेशनल आर्मी के संग्राम से उत्‍पन्‍न बेमिसाल चेतना से अंग्रेज हुकूमत भयभीत हो उठी और ब्रिटिश आर्मी के चीफ कमांडर जनरल आकिनलेक की रिपोर्ट से यह तथ्‍य सिद्ध हो जाता है, जिसमें कहा गया था कि सुभाषचंद्र बोस का भूत लालकिले से निकल कर भारत के प्रत्‍येक कैंटोन्‍मैंट में घूम रहा है। ब्रिटिश आर्मी के भारतीय सैनिकों और अफसरों पर अब ब्रिटिश वफादारी के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता। 1857 जैसे विद्रोह की और बडे़ पैमाने पर पुनावृति हो सकती है। यही वह खौ़फ था, जिसने अंग्रेजों को सदैव के लिए भारत को अलविदा कहने के लिए विवश कर दिया।

    आजादी का दौर शुरू हुआ और जिस तरह की शासकीय नीतियों का सृजन प्रारम्‍भ हुआ, उससे एक बात पहले ही स्‍पष्‍ट हो गई कि किसानों के देश में और दो बैलों की जोडी़ वाले चुनाव चिंह वाली सत्‍तानशींन कॉंग्रेस किस तरह प्रथम पंचवर्षीय योजना काल से ही किसानों की उपेक्षा पर आबद्ध हुई। यह सिलसिला आज 63 साल बाद भी अबाध गति से जारी है। तेज औद्यौगिकरण की चाहत ने सबसे पहले किसान हितों की बलि चढा़ई और इसके पश्‍चात गॉंधी को सबसे प्‍यारे दुलारे रहे कुटीर और छोटे उद्योगों को बरबाद कर दिया गया। अब तो सरकार की बस एक ही रीति नीती है कि ग्‍लोब्‍लाइजेशन के दौर देश का कारपोरेट सैक्‍टर किस गति से आगे बढे़ और फले फूले।    इस विनाशकारी नीति का नतीजा सामने आ रहा है कि विध्‍वंसकारी नक्‍सलवाद बेकाबू हो चला है। देश का किसान और नौजवान आत्‍महत्‍या पर उतारू है। विगत दस वर्षो के दौरान तकरीबन दो लाख किसान और दस लाख नौजवान आत्‍मघात कर चुके हैं। मुठ्ठी भर कारपोरेट जाइंट्स समृद्धि और संपन्‍नता की सीढियां लांघ रहे हैं। राष्‍ट्र में भ्रष्‍टाचार अनाचार, व्‍याभिचार और अत्‍याचार अपने नए नए रिकार्ड कायम करने में जुटा हुआ है।

  ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ खराब ही खराब हुआ है। सामंतवाद की बेडियां तोड़ कर देश की नारी शक्ति आगे बढ रही है। हॉलाकि लाखों बेटियां अभी भी कोख में कत्‍ल हो रही हैं। हमारे प्रतिभाशाली नौजवान विश्‍व में आई टी इंकलाब के अगुआ बन चुके हैं। शिक्षा मौलिक अधिकार बन गई, किंतु करोडो़ बच्‍चे स्‍कूल नहीं जा पाते। हमारे बहादुर सै‍न्‍य योद्धाओं अभी धर्मान्‍ध जेहादियों के इरादों को असीम बलिदान देकर नाका़म किया है। देश में समृद्धि और संपन्‍नता में निरंतर वृद्धि हुई और दुनिया के सबसे अधिक अमीरों की गिनती में तकरीबन आधे भारत के हैं। अमेरिका और चीन के पश्‍चात सबसे अधिक जीडीपी वाला देश भारत बन गया, किंतु बढती आबादी के बोझ और धन के अन्‍याय पूर्ण बंटवारे ने 40 करोड़ भारतीयों को गुरबत के भयावह गुबार से निकलने नहीं दिया। आजादी के दिवाने इंकलाबियों का एक शानदार, शक्तिशाली और समतावादी भारत बनाने का स्‍वप्‍न अभी अधूरा है। इसे साकार करने की खातिर बेहद समझदारी के साथ प्रयास करना होगा। आजादी के दौर में देश के प्रजातांत्रिक सत्‍ता संस्‍थान जातपांत, मजहबी, माफिया और दौलतमंद उन्‍मादियों की गिरफ्त में आ गए हैं। इन सर्वोच्‍च प्रजातांत्रिक संस्‍थानों को इन तत्‍वों के कब्‍जे से मुक्‍त कराना होगा। समस्‍त देशभक्‍त शक्तियों को अपने उनींदेपन से उठकर जातपांत में विभाजित देश के किसान मजदूरों को एकजुट करना होगा। भाषाई, इला‍काई और अन्‍य संकीर्णताओं से मुक्‍त एकजुट किसान और मजदूर महान् क्रांतिकारियों का स्‍वप्‍न कोे अवश्‍य ही साकार कर सकते हैं।

प्रभात कुमार रॉय

  पूर्व प्रशासनिक अधिकारी