महान् इंकलाबी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी
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अक्तूबर जन्म दिवस
प्रभात कुमार राय
कानपुर में सांप्रदायिक उन्माद को शांत करने की खातिर गणेश शंकर विद्यार्थी ने
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मार्च स्न 1931
अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। उनकी शहादत को अत्यंत आदर के साथ सदैव ही स्मरण
किया जाता है। विद्यार्थी जी शहादत के अवसर पर अपनी अक़ीदत पेश करते हुए महात्मा
गांधी ने कहा था कि वह भी गणेश शंकर जैसी मृत्यु कि चाहत रखते हैं। महात्मा की यह
चाहत पूर्ण हुई और उन्हें भी गणेश विद्यार्थी की तरह ही एक सांप्रदायिक ध्र्मान्ध
उन्मादी के हाथों से शहादत हासिल हुई। एक महान् इंकलाबी पत्रकार और साम्प्रदायिक
सद्भाव के प्रबल अलंबदार के तौर पर विद्यार्थी जी को युगों तक याद किया जाएगा। गणेश
शंकर की मृत्यु जितनी अधिक गौरवमयी रही उससे भी कहीं
अधिक शालीन और गौरवमय रही उनकी जिंदगी।
शहीद ए आजम सरदार
भगत सिंह को पत्रकारिता और लेखन में शिक्षित दीक्षित करने का पूर्ण श्रेय गणेश
श्ंाकर विद्यार्थी को प्रदान किया जाता है। अपने कानपुर प्रवास की अवधि में भगत
सिंह ने उनके द्वारा संपादित और प्रकाशित ‘साप्ताहिक
प्रताप’
में अनेक लेख लिखे थे। भगत सिंह की निजी डायरी भी शहादत के पश्चात विद्यार्थी जी के
कागजों के ढेर के बीच से हासिल हुई थी। अपने दौर के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ उनका
गहन संबध् रहा। जंगे ए आज़ादी के दौर में क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन की बुनियाद रखने
वालो में कानपुर के ही मौलाना हसरत मौहानी के साथ विद्यार्थी जी का नाम बहुत आदर के
साथ लिया जाता है।
मात्रा 41
वर्ष तक जिंदगी जीने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी ने ग्वालियर राज्य की सेवा में
कार्यरत एक स्कूल टीचर के घर 26
अक्तूबर 1890
में जन्म लिया था। गरीब पिता की इच्छा थी कि मिडिल पास करके बेटा कहीं किसी सरकारी
नौकरी ले लग जाए। किंतु नियति ने तो कुछ और ही निर्णय लिया हुआ था। हाई स्कूल के
बाद आगे की शिक्षा दीक्षा के लिए चले आए इलाहबाद,
जोकि आजादी के आंदोलन का एक गढ़ बन रहा था। यहीं से ‘अभ्युदय’
और ‘सरस्वती’
जैसी पत्रिकाओं से अपने पत्राकारिता जीवन का आग़ाज़ किया। अािखरकार गणेश श्ंाकर ने
9
नवबंर 1913
को कानपुर से ‘साप्ताहिक
प्रताप’
का प्रकाशन प्रारम्भ किया। प्रताप के प्रकाशन के साथ ही उसके इंकलाबी तेवर प्रकट
होने लगे। परिणामस्वरुप ब्रिटिश हुकूमत का कहर बरपा होना भी उस पर शुरु हो गया। कभी
प्रताप प्रेस लेखन सामग्री जब्त हुई तो कभी प्रेस की जमानत राशि जप्त करके उस पर
सरकारी ताला ठांेक दिया गया। प्रताप से जुड़े सभी व्यक्तियों की जिंदगियों पर सरकारी
कोप बरसता रहा। सबसे अध्कि कोप भाजन बने ‘साप्ताहिक
प्रताप’
के संपादक और मुख्य ट्स्टी गणंश श्ंाकर विद्यार्थी।
निरंतर जेल यात्राएं करते हुए और अपनी कलम से इंकलाब की आग प्रज्वलित करते हुए उनकी
मुलाकात हुई मूर्धन्य कवि और पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी के साथ। दोनों ही बहुत ही
इंकलाबी तेवर के पत्रकार लेखक रहे और प्रगाढ़ मित्र भी रहे। एक बार माखन लाल
चतुर्वेदी के साथ प्रवास करते हुए उन्होने कुछ पफुरसत के लम्हों में अपनी मां को एक
ख़त लिखा था। जिसमें उन्होने लिखा था कि ‘मैं
तुम्हें कष्ट ही कष्ट देता रहा। मैंने अपना दिल पथ्थर का कर लिया है। मैं एक बड़ा
पापी हूं। अम्मा मुझको इस जीवन में क्षमा करना। यदि मैं अपने पैरों को पीछे खींच
लिया तो जीवन विष तुल्य हो जाएगा। आपके पुण्य प्रताप से बहुत कुछ सह गया हूं। आशीष
दो कि मन मष्तिक अत्यंत दृढ़ बना रहे और मैं अधिक से अधिक पीड़ा सह सकूं। देशभक्ति की
राह में विपत्तियां तो आती ही हैं। आशीष दो मेरी आत्मा को ताकत मिलेगी।’
चरणरज गणेश शंकर
अनेक बार प्रताप प्रेस
पर ब्रिटिश सरकार का जुर्माना हुआ किंतु विद्यार्थी जी ने कदाचित जुर्माना अदा नहीं
किया और सदैव जेल चले गए। उन पर कितने ही सरकारी मुकदमे चले और कितनी बार जेल
यात्राएं अंजाम दी,
किंतु सदैव अपने क्रांति पथ पर अविचल अडिग रहे। तभी तो ‘हिंदुस्तान
सोश्लिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’
का कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद उनसे इस कदर प्रभावित रहा कि भगत सिंह जैसे साथी को
अध्ययन एवं लेखन कार्य में शिक्षित दीक्षित करने के लिए उसे गणेश शंकर विद्यार्थी
के पास ले गया था । कानपुर के प्रताप प्रेस भवन में रहकर भगत सिंह बहुत कुछ पढ़ा,
सिखा,
सोचा और लिखा। जोकि इतिहास के पृष्ठों में अब अमर हो चुका है।
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मार्च 1931
कानपुर शहर में अनायास दंगा भड़क गया जिसे शांत करने में विद्यार्थी जी संलग्न हो
गए। एक दंगा पीड़ित परिवार को सुरक्षित स्थान पर पंहुचाने का उन्होने कामयाब प्रयास
किया। इसके पश्चात जब वह वापस आ रहे थे कि मार्ग में ही उन पर कुछ धर्मान्ध तत्वों
ने प्राण घातक प्रहार किया। जिसके परिणामस्वरुप उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। उनकी
बेमिसाल शहादत देश के सभी धर्मान्ध साम्प्रदायिक तत्वों के लिए सदैव चुनौती रही है
और सभी देशभक्त इंकलाबी ताकतों के लिए निरंतर प्रबल प्रेरणा स्रोत रही है।
प्रभात कुमार राय
दिल्ली