चश्मा और गाँधी बाबा दोनों ही कहाँ खो गये

प्रभात कुमार रॉय

    एक खबर आई कि सेवाग्राम वर्धा आश्रम से महात्मा गाँधी के चश्मा गुम हो गया। ये चश्मा नवंबर महीने से गायब रहा , किंतु अनेक माह तक सेवाग्राम वर्धा आश्रम के चैयरपरसन एमएम गडकरी ने गाँधी बाबा के चश्मा गुम हो जाने की घटना को गुप्त बनाए रखा। चश्मा गुम हो जाने की घटना बहुत पहले से ही गाँधी बाबा के सभी सिद्धांत, सभी उसूल, सभी शिक्षाएं और सभी हिदायतें महात्मा गाँधी के नाम पर राजनीति करने वाले राजनेताओं की कार्यनीति और कारकर्दगी से बाकायदा गायब हो चुके थे। गाँधी बाबा का सिर्फ नाम और उनका चित्र ही इन राजनेताओं के जीवन में प्रतीकात्मक तौर पर शेष रह गया जैसा कि संग्रहालय में उनका लाठी, कलम, चश्मा, घडी़ और लंगोटी आदि सामान शेष बचा रह गया। महात्मा गाँधी का नाम अपने प्रणेता के तौर पर लेने वाले सत्तानशीन राजनेता भारत को विश्व पटल पर एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रुप में पेश किया करते हैं। अपने इस दावे को साबित करने के लिए दो तथ्य प्रस्तुत करते हैं, पहला लैटिन अमेरिकन और अफ्रीकन मुल्कों के मुकाबले कहीं अधिक भारत की आर्थिक विकास दर आठ और नौ फीसदी के मध्य बरक़रार बनी हुई है और दूसरा यह कि पाकिस्तान और चीन के विपरीत भारत ने सफलतापूर्वक पंद्रह आम चुनाव आयोजित करा लिए। अतः दुनिया के नक्शे पर जोरदार आर्थिक प्रगति करने वाले कामयाब गणतंत्र के तौर पर भारत को तसलीम किया जा रहा है।

     महात्मा गाँधी अपने जीवन संघर्ष में बारम्बार जिस दरिद्रनारायण जनमानस के जीवन से दरिद्रता खत्म करने की बात करते रहे, उस दरिद्रनारायण जनमानस की जिंदगी की दास्तान कथित स्वराज हासिल हो जाने के 64 सालों के बाद भी कदाचित तब्दील नहीं हुई है। भारत माता की 45 करोड़ अधिक संतानें दरिद्रता की सरहदी रेखा से नीचे अपना जीवन व्यतीत करने के लिए विवश रही हैं। भारत की आर्थिक विकास दर आठ और नौ फीसदी कायम रहने के बावजूद राष्ट्र के 15 करोड़ युवा बेरोजगार क्यों बने हुए हैं। अर्थशास्त्र स्वीकार करता है कि बेरोज़गारी सदैव ही दरिद्रता के मुकाबले कहीं अधिक दुखदाई हुआ करती है और आर्थिक रुप से विकासशील राष्ट्र में भयावह अपराधों के के ग्राफ में निरंतर इज़ाफा अंजाम देती है। महात्मा गाँधी ने 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 नेहरु को सुझाव पेश किया था कि आर्थिक योजना बनाते हुए और उसका कार्यान्वन करते हुए सदैव ही आखिरी दरिद्र इंसान का चेहरा अपनी आँखों के समक्ष रखना चाहिए। महात्मा गाँधी की इस शानदार हिदायत का भारतीय प्रधानमंत्री की कयादत में काम अंजाम देने वाले भारतीय योजना आयोग ने किस तरह से परिपालन किया, यह तथ्य तो समस्त राष्ट्र के समक्ष आ ही चुका है। विगत 64 वर्षो के दौरान जिस तरह से आर्थिक योजनाएं कार्यान्वित की गई, उनके परिणामस्वरुप राष्ट्र ने बहुत तरक्की की, किंतु इस तमाम शानदार तरक्की का संपूर्ण फायदा पहले से ही संपन्न और शक्तिशाली वर्ग को ही हासिल हुआ। राष्ट्र के 70 करोड़ किसान आज़ादी के दौर में और भी अधिक गहन दरिद्रता की गर्त में चले गए। 1991 के बाद कथित मनमोहना नई आर्थिक नीति के लागू होने के पश्चात देश के दो लाख से अधिक किसान आत्मघात कर चुके हैं। किसानों के आत्मघात करने का आंकडा़ प्रतिवर्ष बढ ही रहा है। किसानों जैसे दरिद्र हालात ही राष्ट्र के 40 करोड़ असंगठित मेहनतकशों के भी बने रहे।

  

  गाँधी बाबा के विचारों और विरासत को वर्तमान संदर्भ में निरुपित करते हुए प्रख्यात कवि पं0 भरत व्यास ने काव्यात्मक रुप प्रदान किया-

 

काला धन और काला व्यापार रिश्वत का है गरम बाजार

देख ले बापू तू खुद ही अब तेरे टूट गया चरखे का तार             

तेरी हिंदी के पाँवों में अंग्रेजी ने डाल दी डोर

तेरी लकडी़ ठगों ने ठग ली तेरी बकरी ले गए चोर

  

 महात्मा गाँधी का वहशियाना भौतिक कत्ल तो नाथूराम गोडसे ने किया था किंतु, उनका नैतिक कत्ल उन सियासतदानों और कथित समाजसेवकों ने अंजाम दिया, जिन्होने गाँधी का पवित्र नाम रोज रोज लेते हुए, गाँधी के दरिद्रनारायण जनमानस की अकूत राष्ट्रीय संपदा को लूट कर काले धन के जखीरे के तौर पर विदेशी बैंकों में अपने खातों में बाकायदा जमा कर लिया। महात्मा गाँधी की नैतिक शक्ति को उनकी मौत के पश्चात समूचे विश्व ने स्वीकारा और सराहा, किंतु उनके अपने वारिसों ने उनके विचारों और उनकी तालीम को ठोस व्यवहार के धरातल पर पूर्णतः रौंदा और नक़ार दिया। गहन रुप से धार्मिक महात्मा गाँधी ने जीवन पर्यन्त धर्मान्ध सांप्रदायिक ताकतों से लोहा लिया, किंतु उनकी तस्वीर हाथों में उठाए फिरने वालो और राजघाट पर फूल चढा़ने वालो ने राष्ट्र की राजधानी में ही चार हजार से अधिक बेगुनाह सिखों का वहशियाना कत्लो गारद अंजाम दिया। एक अन्य राजनीतिक तंजीम ने जिसने कि गाँधी को उनके जीते जी नक़ारा, किंतु सियासी फायदा लेने के लिए बाद में अपने सम्मेलनों और दफ्तरों में उनके फोटो टांग लिए। इसी राजनीतिक दल ने गाँधी बाबा के रघुपति राघव राजा राम का मंदिर बनाने के लिए देश भर में सांप्रदायिक तांडव कराया, जिसमें दस हजार से अधिक बेगुनाह नागरिक कत्ल हुए। दलगत सरहदों को आरपार गाँधी का नाम जपने वाले आखिर किस राजनीतिक दल के राजनेताओं ने अपने आचरण में महात्मा गाँधी के विचारों और उनकी नैतिक विरासत की धज्जियां नहीं बिखेर डाली।

   इस सबके बावजूद गाँधीवाद की नैतिक ताकत कदाचित कभी कम न होगी। गाँधीवाद से प्रेरित गाँधी कैप धारण किए अन्ना हजारे नाम का एक शख्स फिर से समूचे अनैतिक भ्रष्ट्र तंत्र को चुनौती पेश कर रहा है। इससे पू्र्व 1970 के दशक में गाँधीवादी जयप्रकाश नारायण ने संपूर्णक्रांति  का नारा बुलंद करके भ्रष्ट सत्ता प्रतिष्ठान को जबरदस्त चुनौती दी थी। इसके पश्चात विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1987 में सत्तीनशीन भ्रष्टाचारियों को ललकारा था किंतु दुर्भाग्यवश भ्रष्टाचार विरोधी दोनों ही मुहिम ऐतिहासिक तौर पर नाक़ाम रही। गाँधी बाबा अब मात्र किसी महान् शख्स का नाम नहीं रहा गया है, वह तो एक जबरदस्त संघर्षशील सार्वभौमिक नैतिक विचार बन चुका है, जो राष्ट्र से भष्ट्राचार, लूटमार, अनाचार, अत्याचार, व्याभिचार, शोषण, गैरबराबरी और दरिद्रता को खत्म करने के लिए सदैव जूझता रहेगा और दरिद्रनारायण जनमानस की अंतिम विजय होने तक लड़ता ही रहेगा। गाँधी का शरीर कत्ल कर दिया, किंतु गाँधी को कदापि मिटाया न जा सका और उनका चश्मा ही क्या, गाँधी बाबा के संग्रहालय का सारा सामान भी गायब हो जाएगा तो भी गाँधी का क्या बिगड़ जाएगा।

 

नारों में हड़तालों में भारत के सब दुखियारों में

गाँधी कदापि नहीं मरा अब जीवित है हत्यारों में

जब तक छूआछात रहेगी जब तक जातपात रहेगी

जातिवाद का कोढ़ रहेगा तब तक महात्मा नहीं मरेगा

जब तक सरमायादारी है जब तक जनता बेचारी है

मेहनतकश की लाचारी है जब तक सत्ता हत्यारी है

हत्यारी सत्ता से कौन लडे़गा तब तक गाँधी नहीं मरेगा।

 

(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)