साक्षात देवी दुर्गा अथवा कोई डैमन
प्रभात कुमार रॉय
इंदिरा गांधी को उनके प्रशंसकों ने सन्
1971
में बांग्ला देश विजय के पश्चात उन्हे साक्षात देवी दुर्गा स्वरुप कहकर संबोध्ति
किया था किंतु कुछ ही वर्षो के बाद आपातकाल का ऐलान करने के बाद जेपी की संपूर्ण
क्रांति के हिमायती तकरीबन एक लाख से अधिक संघर्षशील एक्टीविस्ट को जेलों में डाल
देने पर उनके मुखर कटु विरोधियों द्वारा मैडम इंदिरा गांधी को तानाशाह डेमन राक्षसी
तक कहकर पुकारा गया। एक दौर में कांग्रेस पार्टी के प्रेसिडेंट रहे देवकांत बरुआ ने
तो इंडिया इज इंदिरा का नारा बुलंद करके प्रंशसक चाटुकारिता का अतिरेक प्रस्तुत कर
दिखाया।
इंदिरा
जी पर कुछ लिखने के लिए कलम उठाने पर मशहूर शायर शकील बंदायूनी के गीत की ये
पंक्तियां बरबस ही याद आ जाती हैं जो कुछ इस प्रकार हैं
ना मैं भगवान हूं ना मैं शैतान हूं
अरे दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इंसान हूं
मुझमें भलाई भी मुझमें बुराई भी
लाखो हैं खोट दिल में थोड़ी सफाई भी
थोड़ा सा नेक हूं थोड़ा बेईमान हूं
अनेकता में एकता के दिव्य राष्ट्रीय महामंत्र को साकार कर दिखाने वाले भारत देश की
नेता तौर पर इंदिरा गांधी ने इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। भारत की आज़ादी के बासठ
वर्षो की अवधि में कुल मिलाकर ग्यारह प्रधानमंत्रियों रहे। उन सभी के बीच उनका आखिर
क्या स्थान हैए यह एक अत्यंत विवादित सवाल रहा है। एक तथ्य तो तय है कि समस्त
आलोचना प्रत्यालोचना के बावजूद इतिहास उन्हें भारत के कुछ महान प्रधानमंत्रियों में
अवश्य ही शुमार करेगा।
सन्
1966
में लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के पश्चात मुरारजी देसाई को कांग्रेस
संसदीय दल चुनाव में निर्णायक रुप से पराजित करके इंदिरा गांधी प्रधनमंत्री के पद
पर आसीन हुई थी। कांग्रेस के कटु आंतरिक सत्ता संर्घषों में कांग्रेस विभाजित हो गई
और उनकी सरकार अल्पमत में आ गईए किंतु वह विजयी होकर निकली। बैंक नेशनलाइजेशन और
ब्रिटिश राज के पूर्व सामंतो के प्रिवीपर्स खात्मे ने उन्हें राजनीतिक तौर पर
भारतीय साम्यवादियों के निकट ला दिया।
1969
से
1971
तक इंदिरा जी की अल्पमत केंद्रीय सरकार वस्तुतः साम्यावादियों के समर्थन से ही चली।
फिर
सन्
1971
में पाकिस्तान के साथ हुई थी निर्णायक जंग और बंग्ला देश वजूद में आया। इस अत्यंत
विषम जंग में पाकिस्तान के साथ अमेरिका और चीन खड़े थे। इन विपरीत हालात में
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शीर्ष नेता होने के बावजूद इंदिरा जी ने सोवियत रुस के साथ
एक स्पष्ट सैनिक समझौता अंजाम दिया। जिसके चलते अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में
सैन्य दख़ल नहीं दे सका था और पाकिस्तान विभाजित हो गया। दुनिया के नक्शे पर बंग्ला
देश का उदय हुआ।
इंदिरा गांधी अपने पिता पंडित नेहरु की तर्ज पर एक
आर्दशवादी राजनेता नहीं थीए वरन् एक अत्यंत व्यवहारिक राजनीतिज्ञ साबित हुई। वह एक
अदम्य साहसीए एक उत्कट देशभक्त और बेमिसाल वतनपरस्त राजनेता थीए जोकि अपने देश के
हित में जूनून की किसी भी हद तक भी जा सकती थी।
देश
पर जबरन आपातकाल थोपने की अपनी राजनीतिक गलती का परिणाम इंदिरा जी ने पहली बार सन्
1977
के आम चुनाव में सत्ता गवां कर भुगत लिया। इंदिरा जी द्वारा बाद में अंजाम दी गई
भयंकर रणनीतिक भूल का भुगतान तो अपनी जान देकर किया गया। सन्
1980
सत्ता में वापस आने के बाद इंदिरा गांधी द्वारा पंजाब में अकालियों की चुनौती के
बरखिलाफ जरनैल सिंह भिडरवाले को अप्रत्यक्ष समर्थन देने के कारण पंजाब में
खालिस्तानी आतंकवाद का उदय हुआ। अमृतसर में फ़ौज ने खालिस्तानियों के बरखिलाफ
ब्लूस्टार आपरेशन अंजाम दिया। अकाल तख्त को गंभीर क्षति पंहुची जिससे कि आम देशभक्त
सिख भी अत्यंत आहत हुए। आखिरकार इंदिरा जी पर उनके सुरक्षा कर्मियों ने ही हमला कर
दिया और उन्होने शानदार शहादत पाई।
इंदिरा गांधी की राजनीतिक जिंदगी और प्रधानमंत्री के तौर
पर वतन की सुरक्षा नीति और विदेश नीति से उनकी पार्टी कांग्रेस का नेतृत्व उनसे
संजीदा सबक ले सकता है। उन्होने अत्यंत चतुराई के साथ पाकिस्तान और चीन की दोतरफा
चुनौतियों का कामयाबी के साथ सामना किया। साथ ही साथ अमेरिका और चीन के साथ बहुत ही
जटिल दोस्ती की बुनियाद भी रखी। विश्व की एक महाशक्ति अमेरिका और युनाइटेड नेशन के
स्थायी सदस्यों के मुखर विरोध् के बावजूद बंग्ला देश को आज़ाद कर दिखाया। सर्वविदित
है कि यूनाइटेड नेशन के
104
सदस्य देशों ने बांग्ला देश में भारत के सैन्य अभियान को तत्काल प्रभाव से समाप्त
करने के लिए अपना फैसला दिया था। इस जंग में भारत को अभूतपूर्व फ़तह हासिल हुई और
93
हजार पाक सैनिकों ने हिदुस्तान के सैन्य कमांडरों के समक्ष हथियार डाले थे।
इंटरनेशनल राजनीति और कूटनीति की कुटिलताओं में
सैद्वांतिक नैतिकता के स्थान पर देशहित ही सर्वोपरि हुआ करते हैंए देश की
प्रधानमंत्री के रुप में इंदिरा गांधी ने बखूबी यह सोचा समझा और निभाया था कि इसी
कारण निर्गुट आंदोलन की सुप्रीम लीडर होते हुए भी उन्होने देशहित में कम्युनिस्ट
सोवियत रुस के साथ
1971
में सैन्य समझौता करने में जरा सी भी हिचक नहीं दिखाई थी।
अपने पिता पंडित नेहरु की परमाणु ताकत का शांतिपूर्ण इस्तेमाल की नीति पर
बाकायदा कायम रहते हुए भी इंदिरा गांधी ने सन्
1980
में दोबारा केंद्रीय सत्ता संभालने के पश्चात परमाणु अस्त्रा शस्त्रों के विकास का
काम अंजाम दिया। विश्व की महाशक्तियों से भारत की परमाणु सुरक्षा का कोई ठोस
आश्वासन नहीं मिला तो इंटरनेशनल एनपीटी परमाणु अप्रसार संधि के बाहर रहने का फैसला
अंजाम दिया। इंदिरा गांधी की कयादत में पोखरन में प्रथम परमाणु बम का सपफल परीक्षण
किया गया।
बहुआयामी
व्यक्तित्व वाली इंदिरा गांधी ने देश के मुपफलिस गरीब जनमानस के लिए अप्रतिम
संवेदना इज़हार किया। उनके लिए बहुत कुछ करने की संकल्प भी दिखाया। देश के करोड़ों
किसानों के लिए ग्रीन रिवोलूशन की वह सृजक रही। जिसने किसी हद तक देश को खाद्य
सुरक्षा प्रदान की। अत्यंत सादगी और सौंदर्य की प्रतीक इंदिरा गांधी ने अपने बचपन
से ही पुस्तको में गीत संगीत में थियेटर और पिफल्मों में गहन अभिरुचि का एहसास
कराया। कला और विज्ञान को अपने सत्ता काल में भरपूर समर्थन और सरकारी सहायता प्रदान
की।
प्रकृति और पर्यावरण की हिफाज़त और जनसंख्या नियंत्रण के
मक़सद को हासिल करने के लिए कुछ कडे़ कदम उठाए। हांलाकि आपातकाल के कारण नौकरशाही
द्वारा इस संदर्भ में बहुत कुछ अत्याचार भी जनमानस पर किए गए। किंतु इन शानदार
मक़सदों से किसी का कदाचित विरोध हो नहीं सकता। ऐतिहासिक पटल पर इंदिरा गांधी प्रखर
देशभक्ति की प्रतीक बनकर उभरीए जिसके सबसे प्रबल अलंबरदार ऐतिहासिक रुप से कांग्रेस
नेताओं में लोकमान्य तिलकए सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल करार दिए जाते हैं।
वस्तुतः इंदिरा गांधी देशभक्ति की इसी अत्यंत उग्र और देश हितो के मामले में किसी
तरह का समझौता न करने वाली शानदार परम्परा की वाहक रही।