संसद के पुनरुत्थान की प्रबल दरक़ार
(भारत की 60 वर्षीय संसदीय यात्रा)
प्रभात कुमार रॉय
भारतीय गणतांत्रिक राजसत्ता के प्रमुख स्तभों के मध्य संसद सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ के तौर पर सक्रिय रही है। संसद विराट भारतीय जनगण का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। भारतीय संविधान के तहत सैद्धांतिक तौर पर वस्तुतः जनगण का दिलो दिमाग अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से संसद में परिलक्ष्ति और प्रतिबिंबित होता। विश्व के सबसे विशाल गणतंत्र की संसद अपने दौर की कठिन चुनौतियों से जूझ रही है। सबसे प्रबल चुनौती गहन गणतांत्रिक विश्वसनीयता का गंभीर संकट है। भारतीय जनमानस और संसद के मध्य मानसिक दूरियां निरंतर गति से बढ़ रही हैं। यक्ष प्रश्न है कि जनमानस की आकांक्षाओं के अनुरुप संसद क्या अपने आचरण में खरी उतर रही है ? राजसत्ता परिवर्तन की चाह में भारत के अनेक हिस्सों में प्रबल सशस्त्र संघर्षों का दुर्भाग्यपूर्ण विस्तार इस कटु तथ्य की ओर इंगित नहीं करता कि संसद के माध्यम से शांतिपूर्ण परिवर्तन के संवैधानिक मार्ग से बड़ी संख्या में भारतवासियों का यक़ीन डगमगा गया है। बेहद गुरबत में गुजर बसर कर रहे भारतवासी प्रायः कहते नजर आते हैं कि सभी सासंद गण अपने वेतन और भत्तों में विशाल बढ़ोत्तरी अंजाम देने में तत्काल एकजुट होकर जरा सी देर नहीं करते, किंतु गरीब किसान-मजदूरों की किस्मत संवारने का सासंदों के पास अब वक्त ही कहां है। संसदीय इतिहास में एक दौर ऐसा भी रहा कि भारतीय संसद को प्रबुद्ध वकील, डाक्टर, पत्रकार, लेखक और सामाजिक-राजनीतिक लीडर सुशोभित किया करते थे। एक दौर आज का है कि संसद में अनेक सांसदों की पहचान माफिया अपराधियों, अरबपति और खरबपति संसद सदस्य के तौर पर ही होती है। रविवार 13 मई, 2012 को भारतीय संसद ने अपनी गतिशील यात्रा के 60 वर्ष मुकम्मल कर लिए। ऐतिहासिक तौर पर भारतीय संसद अपने प्रारम्भिक दौर में महान् वैदिक मंत्र वादे वादे जायते तत्व बोधा (वाद-विवाद करने से ही तत्व ज्ञान होता है) के अनुरुप शानदार आचरण को अंजाम देने वाली सर्वोच्च विधायिका रही, जोकि आज के दौर के जबरदस्त व्यवधानों, बहिष्कारों, हंगामों और शोरशराबों से सराबोर है। जंग-ए-आजादी के तपे तपाए योद्धाओं से लबरेज अति समर्थ और समृद्ध संसद ने भारतवासियों के चिरंजीवी स्वप्नों को साकार करने के लिए कार्यपालिका का पथ प्रशस्त करने का शानदार प्रयास अंजाम दिया। संसद के दोनों सदनों के पक्ष और विपक्ष में एक से बढकर एक मूर्धन्य सांसद विराजमान रहे। ट्रेजरी बैंचों पर जवाहरलाल नेहरु, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद, रफीअहमद किदवई, पं. गोविंदबल्लभ पंत, डा. आम्बेडकर, कृष्णा मेनन, लालबहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नंदा, अशोक मेहता, महावीर त्यागी, इंदिरा गाँधी, बाबू जगजीवनराम, चौ. चरणसिंह, श्यामनंदन मिश्र सरीखे अनेक प्रखर व्यक्तित्व रहे तो दूसरी ओर विपक्ष में श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डा. राममनोहर लोहिया, एके गोपालन, हीरेन मुखर्जी, प्रोफेसर बलराज मधोक, अटलबिहारी वाजपेयी, इंद्रजीत गुप्त, नाथ पाई, भूपेश गुप्त, मधु लिमए, समर गुहा, प्रकाशवीर शास्त्री, सोमनाथ चटर्जी आदि अनेक तेजस्वी नेता रहे। उच्च कोटि के विद्वान वक्ताओं की मौजूदगी के कारण ही संसद में बहस-मुबाहिसों का स्तर अत्यंत उत्कर्ष्ट बना रहा। आज के दौर के निस्तेज औपचारिक प्रश्न काल के विपरीत पुराने संसदीय दौर का प्रखर प्रश्न काल याद आता है, जिसमें प्रायः अग्रणी सांसद संपूर्ण तैयारी के साथ शिरकत अंजाम दिया करते थे और केंद्रीय हुकूमत के वरिष्ठ मंत्रियों के छक्के छूट जाया करते थे। भारतीय संसदीय इतिहास में प्रथम अवसर पर संसद के ग्यारह सांसदों को संसद से बर्खास्त किया गया। एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन के तहत संसद के प्रश्न काल में प्रश्न पूछने के लिए क्रमशः तीस हजार से एक लाख रुपयों तक की मांग करते हुए पाए गए और ग्यारह सांसद कैमरे की आँख में उतर गए। इसके पश्चात चार सांसदों को अपनी संसद सदस्य निधि से किसी विशिष्ट प्रोजेक्ट हेतु अनुशंसा करने के लिए घूस की मांग पेश करने के लिए संसद से बर्खास्तगी का दंड भुगतना पड़ा। एक सांसद महोदय को कबूतरबाजी में संलिप्तता के कारण बर्खास्त होना पड़ा। वाम मोर्चा ने न्यूक्लियर डील पर मनमोहन हुकूमत से समर्थन हटाया तो संसद में सरकार बचाने की प्रक्रिया में लोकसभा में शर्मनाक कैश फॉर वोट स्कैंडल सामने आया कि आखिर किस तरह से सांसदों की खरीद फरोख्त अंजाम दी गई। आज के दौर में माननीय सांसद गण द्वारा भारतीय संसद के तकरीबन तीस फीसदी अमूल्य वक्त को बाकायदा व्यर्थ शोरशराबों और बहिष्कार में बरबाद कर दिया जाता है। संसदीय कार्य हेतु यह बेशकीमती वक्त भारतीय जनगण के कल्याण के लिए कानूनों का निर्माण करने के लिए संविधान ने नीयत किया है। लोकसभा के पूर्व स्पीकर शिवराज पाटिल ने सांसदों के लिए आचरण संहिता की तशकील करने की पेशकश की। संसद की विशेषाधिकार समितियों ने संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के लिए आचार संहिताओं का निर्माण अंजाम दिया। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि संसदीय आचार संहिताओं का क्रियान्वन करने वाली संसदीय समितियां की निरंतर निष्क्रिय बनी रही। इस निष्क्रियता का परिणाम संपूर्ण संसदीय प्रक्रिया को भुगतना पड़ रहा, जिसकी अपनी गौरवपूर्ण छवि को कुछ सांसदों के गैरजिम्मेदार और अराजक आचरण से गंभीर आघात लगा है। भारतीय संसद में तकरीबन 162 सदस्य गण अदालतों में आपराधिक मुकदमों को झेल रहे हैं। इन 162 सांसदों में कुछ सांसदों पर तो पुलिस प्रोसीक्यूशन द्वारा गंभीर किस्म के संगीन इल्जामात के तहत अदालतों में मुकदमे दायर किए गए। राजनीति का आपराधिकरण रोकने के लिए सन् 1960 के दशक में संथानम् कमेटी ने कुछ कारगर अनुशंसा अंजाम दी, जिन पर हुकूमत ने कदाचित अमल नहीं किया। राजनीति के अपराधिकरण का राज-रोग बढ़ता ही चला गया और इसकी व्यापक रोकथाम के लिए सन् 1990 के दशक में एन.एन वोहरा कमेटी का गठन किया गया। एन.एन वोहरा कमेटी ने अनुशंसा अंजाम दी, जिसके तहत संज्ञेय संगीन इल्जामात के तहत दायर मुकदमों का सामना कर रहे आरोपियों को सभी विधायिकाओं के लिए चुनाव प्रत्याशी बनाने पर पूर्ण पाबंदी आयद की जाए। तकरीबन 17 वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात भी एनएन वोहरा कमेटी की सिफारिशों पर कोई अमल नहीं किया गया। संगीन अपराधियों के राजनीति में प्रवेश का पूर्ण निषेध करने के ज्वलंत राष्ट्रीय प्रश्न पर भारतीय हुकूमत की इच्छा शक्ति के मुकम्मल आभाव के कारणवश संसद और विधान सभाएं संगीन अपराधियों की मौजूदगी के कारण कलंकित बनी रही। जब भी कोई शख्स संगीन आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसदों के कारणवश आम तौर पर निर्मित हुई खराब छवि को लेकर कोई सार्थक टिप्पणी कर देता है तो माननीय सांसद गण बिगड़ी छवि को दुरुस्त करने के कारगर तौर-तरीकों पर विचार विमर्श करने और सही दिशा में कारगर कदम उठाने के स्थान पर एकदम आक्रोशित हो उठते हैं। टीवी चैनल्स पर लोकसभा और राज्यसभा कार्यवाही के सीधे प्रसारण के कारण आम जनमानस की आँखों से सांसदों का आचरण अब कुछ छुपा नहीं रह गया है। बेहतर है विछलन का परित्याग करके कि सभी प्रमुख राष्ट्रीय दल आपस में गहन विचार विमर्श करके संसद की गरिमा का पुनरुत्थान करने का गंभीर प्रयास करें, ताकि भारतीय गणतंत्र के सबसे अहम स्तंभ संसद के गौरव को बचाया जा सके और उसकी गणतांत्रिक विश्वसनीयता को भी बरक़रार रखा जा सके। संसद पुनरुत्थान के पुनीत कार्य में पहले ही बहुत देर हो चुकी है और अधिक देर भारत की गणतांत्रिक छवि को विरल क्षति पंहुचाएगी।