स्वामी विवेकानंद
(लेखक-प्रभात रॉय)
इस
वर्ष सारा राष्ट्र स्वामी
विवेकानंद
की 150 वीं जन्म-शती मना रहा है। स्वामी जी द्वारा दिया गया विचार-दर्शन युग-युगीन
और शाश्वत है। उनकी दिव्य वाणी अमरता का महान् संदेश प्रदान कर रही है। स्वामीजी के
दर्शन की आज भी उतनी ही प्रासंगिकता है जितनी विगत 20 वीं सदी में रही थी। मात्र 39
वर्ष की आयु में बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उनका देहान्त हो गया था। तब से आज तक
दुनिया बहुत कुछ बदल चुकी है,
भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पूर्ण यौवन की दहलीज पर खड़ा है और विभिन्न
समस्याओं का सामना कर रहा है। ऐसी स्थिति में
स्वामी जी द्वारा दिए गए संदेश पाथेय हो सकते हैं। स्वामी जी भारत को अमर भारत
क्यों कहा करते थे। इस राष्ट्र का अपना जीवन उदेश्य है। भारत को भारत ही रहना होगा
और तभी दुनिया का भला होगा। भारत का प्राण तत्व हिंदुत्व है और उसका पर्याय मानवता
है। उनके शब्दों में- हम लोग हिन्दू हैं- यदि आज हिन्दू शब्द का कोई बुरा अर्थ
लगाया जाता है,
तो उसकी परवाह मत करो। हम अपने आचारण से दिखा दें कि संसार की कोई भी भाषा इससे
महान् शब्द का आविष्कार नहीं कर पाई। शिकागो में दिये गए भाषण में उनका कहना था-
‘यह
वह भारत भूमि है,
जो विश्व के दुखियों, उत्पीड़ितों,
वंचितों की शरण-स्थली रही है।’
स्वामी
जी का विचार था कि समाज परिवर्तन सचरित्र और
देशभक्त व्यक्तियों के माध्यम से होता है। जो मनुष्य समस्या को पैदा करता है, दरअसल
वही समस्या का समाधान करने वाला भी होता है। वे कहते हैं कि मनुष्य में देवत्व को
जगा दो- देखो! फिर पृथ्वी पर स्वर्ग उतर
आएगा। वास्तव में आज भारत की मूल समस्या सचरित्र नागरिक का न होना ही है। राजनेता
भ्रष्ट हैं,
स्वार्थी हैं,
सत्ता-लोलुप हैं और संवेदनहीन हैं। ऐसा क्यों?
अपने देश में लोकतंत्र है,
जनता अपने प्रतिनिधि चुनती हैं। क्योंकि भारत के आम नागरिक का सचरित्र नहीं है।
इसलिए स्वामी जी कहते थे कि
‘
मनुष्य निर्माण करो’
सब समस्याओं का समाधान हो जाएगा। उन्होंने एक स्थान पर कहा था कि
‘रुपये
आदि अपने आप ही आते रहेंगें । रुपये नहीं,
मनुष्य चाहियें।’
मनुष्य सब कुछ कर सकता हैं। मनुष्य चाहिएं-जितने मिलें,
उतना ही अच्छा। आज देश के पास प्रचुर भौतिक साधन है,
पर सचरित्र व्यक्तियों का बहुत ही अभाव है। उनके अनुसार देश की समस्त शक्ति
‘देव-
मानव’
में निहित है। शस्त्रबल और
शास्त्रबल व्यर्थ हैं,
यदि साधारण समाज निर्बल और
निस्तेज है। हमारे राजनेताओं ने देश की जनता को रोटी, कपड़ा और
मकान देने का वादा किया, किंतु उनको चरित्र की दृष्टि से कंगाल कर दिया । स्वामी जी
ने नवीन भारत की परिकल्पना में श्रमजीवियों को सर्वोपरि महत्व दिया। वे प्रबल
समाजवादी थे,
इसलिए नहीं कि समाजवाद आदर्श व्यवस्था है,
बल्कि इसलिए कि वंचित खाली पेट से थोड़ा कुछ बेहतर जीवन मिले । उनका विश्वास था कि
विश्व में देर सवेर क्रान्ति का आना अवश्यम्भावी है। उन्होंने दो देशों का नाम लिया
था- रूस और चीन। यह भी सत्य है कि बीसवीं शताब्दी में ये क्रांतियां घटित भी हुई।
स्वामी
जी को विश्वास था कि सामान्य जन को संस्कारित करने के लिए शिक्षा ही साधन है। केवल
जानकारी देना मात्र ही शिक्षा नहीं है। हम विचारों को आत्मसात कर सकें। वे शिक्षा
में भारत के आदर्शवाद और पाश्चातय प्रौद्यौगिक के समन्वय के पक्षपाती थे। स्वामी जी
ने भारत के संन्यासियों का आव्हान किया कि वे गावों में जाकर धर्म और लौकिक शिक्षा
का दान दे। आज शिक्षा उपभोक्तावाद का शिकार बन चुकी है। स्वामी जी का चित्त भारत की
निर्धनता से अत्यंत व्यथित था। उन्होंने एक स्थान पर कहा था
‘तुमने
पढ़ा होगा’
मातृदेवो भव,
पितृदेवो भव,
अर्थात माता पिता को भगवान समझो। किन्तु मैं कहता हूं कि
‘दरिद्रदेवो
भव,
मूर्खदेवो भव।’
इन गरीब,
अनपढ़ और दुखियों को अपना भगवान मानो। स्मरण रखो,
इनकी
सेवा तुम्हारा धर्म हैं।
वर्तमान भारत में कई समस्याएं हैं- निर्धनता,
निरक्षरता,
जातिवाद और राष्ट्रीय एकता का अभाव परन्तु ये कोई नई समस्याएं नहीं हैं। हमें भी
अपनी इच्छा शक्ति और चरित्रबल पर इससे निपटना ही होगा। चिन्ता का विषय यह है कि
तथाकथित राजनेताओं ने वोट प्राप्ति के लिए समाज को विघटन के कगार पर लाकर खड़ा कर
दिया है। इसलिए स्वामीजी ने स्थिति को भांपकर पहले ही कह दिया कि हमें राजनीति में
पश्चिम की पद्धति को स्वीकार नहीं करना चाहिए। -भारतवासी ही मेरे प्राण हैं,
भारत के देवी-देवता मेरे ईश्वर हैं। भारतवर्ष का समाज
मेरे
बचपन का झूला है.
मेरे यौवन की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।
यह भाव ही हमें एकसूत्र में जोड़ सकता है। यह स्वामी जी का अमर सन्देश था।
स्वामी विवेकानंद के जीवन की शुरुआत देखें तो अद्भुत रोमांच होता है कि कैसे एक
संघर्षशील नवयुवक धीरे-धीरे महागाथा में तब्दील होता चला जाता है। उनका जीवन हम
सबके लिए प्रेरणास्पद है। अपनी महान मेधा के बल पर दुनिया में भारत की आध्यात्मिक
पहचान बनाने में सफल हुए स्वामी विवेकानंद ने सौ साल पहले जो चमत्कार कर दिखाया
वह
आज अत्यंत दुर्लभ है। यह ठीक है कि तकनीकी या आर्थिक क्षेत्र में कुछ उपलब्धियाँ
अर्जित करके कुछ लोगों ने यश और धन अर्जित किया है,
मगर वह उनका व्यक्तिगत लाभ है,
लेकिन स्वामी विवेकानंद ने व्यक्तिगत लाभ अर्जित नहीं किया,
वरन देश की साख बनाने में अपना योगदान किया। उनके कारण पूरी दुनिया भारत की ओर
निहारने लगी। वेद-पुराणों के हवाले से उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय चिंतन की
नूतन व्याख्या की।
‘लेडीज
एंड जेंटलमेन’
कहने की परम्परा वाले देश को उन्होंने यह ज्ञान पहली बार दिया कि बहनों और भाइयों
जैसा आत्मीय संबोधन भी दिया जा सकता है। उन्होंने दुनिया को मनुष्य या परिवार का एक
सदस्य समझने का संस्कार दिया क्योंकि स्वामी विवेकानंद को यही ज्ञान मिला था। यानी
वसुधैव कुटुम्बकम का ज्ञान ।
स्वामी विवेकानंद की जीवन-यात्रा की शुरुआत देखें तो उनका जीवन भी मध्यमवर्गीय
परेशानियों से भरा रहा। पढ़ाई में वे मेधावी थे तो खेल-कूद में भी माहिर थे। कुश्ती
में निपुण थे। कुशल तैराक थे। तलवार चलाने में माहिर थे। नाटक और संगीत कला में
रुचि थी। इसीलिए उन्होंने एक नाटक कम्पनी भी बनाई थी। उनका शरीर भी सुगठित था।
किशोरावस्था में ही उन्होंने एक व्यायाम शाला बनाई थी। इसलिए आज जब हम युवा पीढ़ी
के सामने कोई आदर्श प्रस्तुत करने की बात हो तो सबसे पहले कम से कम मुझे तो स्वामी
विवेकानंद का नाम ही याद आता है। दुर्भाग्य से नई पीढ़ी के सामने नायक के रूप में
फिल्मी कलाकार ही आ कर खड़े हो जाते हैं। इन कलाकारों में ज्यादातर का जीवन अनेक
लंपटताओं से भरा रहता है। उनकी हरकतें देख कर युवक समझते हैं कि यही सब हमें ग्रहण
कर लेना चाहिए। फटी चिथड़ी जींस फुलपैंट भी अब फैशन है. यह विवेकहीनता का चरम है.
आज समाज में जो पतन नजर आता है,
उसका असली कारण सिनेमा और टीवी के अश्लील कार्यक्रम भी है। इसलिए नई पीढ़ी का ध्यान
इन सबसे हटाने के लिए कुछ न कुछ जतन करना जरूरी है। सिनेमा के नकली नायक हमारे
आदर्श बिल्कुल नहीं हो सकते । हमारे सामने महान नायकों की लम्बी फेहरिश्त मौजूद है।
इनमें स्वामी विवेकानंद अग्रिम पंक्ति में हैं। उन्होंने किसी पटकथा के सहारे अभिनय
नहीं किया और न संवाद बोले। उन्होंने तो अपने महान ग्रंथों का अवगाहन करके जीवन
जीने की नई वैज्ञानिक-आध्यात्मिक-दृष्टि अर्जित की। स्वामी जी युवकों से कहते थे,
कि
”अपने
पुट्ठे मजबूत करने में जुट जाओ। वैराग्य-वृत्ति वालों के लिए त्याग-तपस्या उचित है
लेकिन कर्मयोग के सेनानियों को चाहिए-विकसित शरीर,
लौह मांस-पेशियाँ और इस्पात के स्नायु।”
तरुण मित्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने हमेशा यही संदेश दिया कि
”शक्तिशाली
बनो। मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्ययन की अपेक्षा फुटबाल द्वारा ही
स्वर्ग के अधिक समीप पहुँच सकोगे। तुम्हारे स्नायु और माँसपेशियाँ अधिक मजबूत होने
पर तुम गीता अच्छी तरह समझ सकोगे। तुम अपने शरीर में शक्तिशाली रक्त प्रवाहित होने
पर श्रीकृष्ण के तेजस्वी गुणों और उनकी अपार शक्ति को हृदयंगम कर पाओगे।”
स्वामी विवेकानंद यह नहीं कहते थे,
कि पूजा-पाठ करो,
भगवत-भजन करो या अध्यात्म में डूब जाओ। वे अपने समकाल से काफी आगे की सोच वाले थे।
वे दकियानूस नहीं थे। वैज्ञानिक दृष्टि
सम्पन्न युवक थे। एक युवक जब एक बार स्वामी जी से मिला तो उसने कहा कि मैं घर के
सारे दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करके आँखें मींच लेता हूँ। पर ध्यान ही नहीं लगाता। मन
को शांति ही नहीं मिलती। तब स्वामी जी ने मुसकराते हुए कहा था,
कि
”तुम
सबसे पहले दरवाजे-खिड़कियाँ खोल दो और अपनी खुली आँखों से बाहर की दुनिया देखो।
तुम्हें सैकड़ों गरीब-असहाय लोग दिखाई देंगे। तुम उनकी सेवा करो। इससे तुम्हें
मानसिक शांति मिलेगी। वे गरीबों की सेवा करने के लिए सबको प्रेरित करते थे। भूखे को
खाना खिलाना,
बीमार को दवाई देना और जो अनपढ़ हैं उन्हें ज्ञान देना। यही है सच्चा अध्यात्म। इसी
से मिलती है मन की शांति।”
स्वामी विवेकानंद का सौभाग्य था,
कि उन्हें अपने माता-पिता से अच्छे संस्कार मिले। सत्य निष्ठा की सीख मिली। बेहतर
गुरू मिले। रामकृष्ण परमहंस जैसे सच्चे मार्गदर्शक मिले। पिता विश्वनाथदत्त जी के
असामयिक निधन के बाद घर चलाने के लिए नरेंद्र नाथ को नौकरी भी करनी पड़ी। यानी उनके
जीवन में सघर्ष का यह दौर भी आया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने जीवन को
कर्मयोग के साथ-साथ आध्यात्मिकता से भी अनुप्राणित करते रहे। और एक समय आया जब वे
विदेश जाने से पहले स्वामी विवेकानंद में रूपांतरित हुए और पूरी दुनिया में भारतीय
संस्कृति की पहचान के रूप में आलोकित हो गए। स्वामी जी के जीवन एवं विचारों को
पढ़ते हुए मैंने यह महसूस किया कि उन्होंने कहीं भी साम्प्रदायिकता को या नफरत को
बढ़ाने वाले संकुचित विचारों का प्रचार-प्रसार नहीं किया। उन्हाने विदेश में प्रवचन
देते हुए कहा था,
कि
”हमें
मानवता को वहाँ ले जाना चाहते हैं,
जहाँ न वेद है,
न बाइबिल है और न कुरान। लेकिन यह काम वेद,
बाइबिल और कुरान के समन्वय द्वारा किया जाना है। मानवता को सीख देनी है कि सभी धर्म
उस अद्वितीय धर्म की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं,
जो एकत्व है। सभी को छूट है कि वे जो मार्ग अनुकूल लगे उसको चुन लें।”
स्वामी जी की सबसे बड़ी विशेषता यही है,
कि वे
‘गर्व
से कहो हम हिंदू हैं’
कहने के बावजूद वैसे हिंदू बिल्कुल नहीं थे,
जैसे आजकल के नजर आते हैं। ये लोग अलगाव और विघटन फैलाने का काम करते हैं।
दंगे-फसाद भड़काने में सहायक होते हैं। हमें बनना है तो स्वामी विवेकानंद जैसा
हिंदू बनना है। शिकागों में व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था,
कि
”मैं
अभी तक के सभी धर्मों को स्वीकार करता हूँ। और उन सबकी पूजा करता हूँ। मैं उनमें से
ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के साथ ईश्वर की उपासना करता हूँ। वे स्वयं चाहे किसी रूप में
उपासना करते हों। मैं मुसलमानों के मस्जिद जाऊँगा। मैं ईसाइयों के गिरजा में क्रास
के सामने घुटने टेक कर प्रार्थना करूँगा: मैं बौद्ध मंदिरों में जा कर बुद्ध और
उनकी शिक्षा की शरण लूँगा। मैं वन में जा कर हिंदुओं के साथ ध्यान करूँगा जो
हृदयस्थ ज्योतिस्वरूप परमात्मा को प्रत्यक्ष करने में लगे हुए हैं।”
सच्चा मनुष्य धर्मस्थलों में भेद नहीं करता। मुझे याद आती है गोस्वामी तुलसीदास की
पंक्तियाँ कि
‘माँग
के खाइबो और मसीद में सोइबो’।
महान ग्रंथ रामचरित मानस के रचयिता ने समाज को जागरण का पथ दिखाने के साथ यह भी
साबित कर दिया कि मुझे कट्टर हिंदू समझने की भूल न करना। कोई भी सच्चा ज्ञानी
साम्प्रदायिक बातें नहीं करेगा। स्वामी जी का समूचा जीवन-दर्शन देखें तो वे कहीं भी
यह नहीं कहते कि हिंदुओं,
तुम अपनी ताकत पहचानो और जो विधर्मी हैं,
उनका नाश कर दो। या फिर यह भी नहीं कहते कि यह देश केवल तुम्हारा है। जो गैर हिंदू
हैं उन्हें यहाँ रहने का हक नहीं है। उल्टे स्वामी जी समूची उदारता के साथ बार-बार
यही कहते हैं,
कि च्मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है।..मनुष्य। केवल मनुष्य ही हमें
चाहिए। समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना को देख कर वे आहत होते थे इसीलिए उन्होंने
कहा था,
”भूल
कर भी किसी को हीन मत मानो। चाहे वह कितना ही अज्ञानी,
निर्धन अथवा अशिक्षित क्यों न हो और उसकी वृत्ति भंगी की ही क्यों न हो क्योंकि
हमारी-तुम्हारी तरह वे सब भी हाड़-माँस के पुतले हैं और हमारे बंधु-बांधव हैं।”
कुल मिला कर देखें तो स्वामी विवेकानंद अपने आप में समूची पाठशाला हैं। यहाँ आने
वाला गंभीर विद्यार्थी जीवन में कभी फेल हो ही नहीं सकता। हर हालत में पास ही होगा।
बशर्ते वह इनकी पाठशाला में भरती तो होना चाहे. स्वामी जी का जीवन,
उनका चिंतन हमें सौ साल बाद भी ऊर्जा से,
जोश से भर देता है। वे अपने जीवन के चालीस साल भी पूर्ण नहीं कर सके थे। चालीस साल
में उन्होंने दुनिया को जो ज्ञान दिया,
जो दृष्टि दी,
वह हमें मार्ग दिखाने के लिए
पर्याप्त है। सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह जी भी चालीस साल तक ही जीए मगर
उन्होंने भी अपने जीवन को एक मिसाल बना दिया था। ये सब उदाहरण हैं जिन्हें देख कर
लगता है कि प्रतिभा के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं रहता। ऐसे अनेक उदाहरण है जो हमें
बताते हैं,
कि विचारों का अमृत-पान कराने में युवा पीढ़ी का ही ज्यादा अवदान है। गाँधी जी भले
ही अस्सी साल के आसपास हमारे बीच से गए लेकिन उनका युवाकाल में ही अपने कर्म से
दक्षिण अफ्रीका और और बाद में भारत वापस आकर सामाजिक जागरण का सूत्रपात कर दिया।
चालीस साल की उम्र में लिखी गई उनकी कृति
‘हिंद
स्वराज’
आज भी तरोताजा लगती है। इसलिए यह मान लेना कि युवा काल मौजमस्ती का काल होता है,
बहुत बड़ी नादानी है। मूर्खतापूर्ण सोच है। युवा पीढ़ी को गुमराह करने की साजिश है।
स्वामी विवेकानंद के जीवन-वृत्त को देखें तो हम कह सकते हैं कि एक युवक अगर ठान ले
तो वह अपने जीवन को नरेंद्रनाथ से विवेकानंद में तब्दील कर सकता है। इसलिए आज की
युवा पीढ़ी को समझाया जाना चाहिए,
या उसे खुद समझना चाहिए कि उसके नायक रुपहले पर्दें के नकली हीरों नहीं हो सकते।
उसे नायक तलाश करना है तो पीछे मुड़ कर देखना होगा। अतीत के पन्ने खंगालने होंगे।
इतिहास से गुजरना होगा। भारत को भारत बनाने में युवा पीढ़ी का ही महती योगदान रहा
है।
आश्चर्य होता है, कि सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने जैसा भारत देखा था,
आज अनेक मोर्चो पर भारत की जस की तस हालत बनी हुई है। इसलिए लगता है,
कि विवेकानंद के सपने को पूरा करने का दायित्व हम सब का है और युवा पीढ़ी का है।
उन्होंने एक बार कहीं कहा था,
कि
”ओ
माँ,
जब मेरी मातृभूमि गरीबी में डूब रही हो तो मुझे नाम और यश की चिंता फिर क्यों हो?
हम निर्धन भारतीयों के लिए यह कितने दु:ख की बात है,
कि जहाँ लाखों लोग मुट्ठी भर चावल के अभाव में मर रहे हों,
वहाँ हम अपने सुख-साधनों के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। भारतीय जनता का
उद्धार कौन करेगा,
कौन उनके लिए अन्न जुटाएगा,
मुझे राह दिखाओ माँ,
कि मैं कैसे उनकी सहायता करूँ।”
स्वामी विवेकानंद आज अगर सशरीर मौजूद होते तो वे अपनी यही वेदना फिर दुहराते हुए
यही बात फिर कहते। आज भी देश में लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे
हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अशिक्षा,
अज्ञानता से ग्रस्त लोगों की संख्या भी करोड़ों में है। धर्म-अध्यात्म अब भरपेट
लोगों का शगल बन गया है। एक पाखंड चारों तरफ पसरा हुआ है कि लोग बड़े धार्मिक हैं।
दरिद्रनारायण के उन्नयन पर कोई खर्च नहीं करना चाहता लेकिन धर्मस्थल या अपनी जाति
या समाज के भवन बनाने में लोगों की बड़ी दिलचस्पी देखी जा रही है। ऐसे समय में
निर्धन वर्ग से नैतिकता या धर्म-कर्म की बातें करना बेईमानी है। छल है। स्वामी
विवेकानंद जी ने गरीबी के मर्म को समझा था,
इसीलिए वे कहते थे,
”पहले
रोटी
और
फिर धर्म। जब लोग भूखों मर रहे हों, तब उनमें धर्म की खोज करना व्यर्थ है। भूख की
ज्वाला किसी भी मतवाद से शांत नहीं हो सकती। जब तक तुम्हारे पास संवेदनशील हृदय
नहीं, जब तक तुम गरीबों के लिए तड़प नहीं सकते,
जब तक तुम उन्हें अपने शरीर का अंग नहीं समझते, जब तक तुम अनुभव नहीं करते कि तुम
और सब दरिद्र और धनी,
संत और पापी-उसी एक असीम पूर्ण के -जिसे तुम ब्रह्म कहते हो,
अंश हैं,
तब
तक तुम्हारी धर्म-चर्चा एकदम व्यर्थ है।”
आज इस दौर में बदहाली में कोई कमी नहीं आई है। ये और बात है कि हमारा समाज इंटरनेट
के युग में प्रविष्ट कर चुका है,
गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी मोबाइल हो सकता है,
लेकिन उसकी बरबादी-बदहाली कम नहीं हुई है। बेरोजगारी,
भूख,
वर्गभेद,
छुआछूत,
अशिक्षा,
अंधविश्वास,
सामंती मनोवृत्ति और
राष्ट्रविरोधी
प्रवृत्ति आदि अनेक बुराइयों से ग्रस्त भारतीय समाज को एक बार फिर स्वामी विवेकानंद
के चिंतनों से रूबरू कराने का समय आ गया है। आज की अधिकांश तरुणाई फिल्मी
हीरो-हीराइनों को अपना रोल मॉडल बनाने की कोशिश कर रही है। जबकि हमारे रोल मॉडल
स्वामी विवेकानंद समेत अनेक युवा क्रांतिकारी,
विचारक ही युग प्रवर्तक हो सकते हैं इसलिए हमें अतीत की ओर निहारते हुए ही भविष्य
का सफर तय करना होगा।
स्वामी विवेकानंद ने भारत में हिन्दू धर्म का पुनरुद्धार तथा विदेशों में सनातन
सत्यों का प्रचार किया। इस कारण वे प्राच्य एवं पाश्चात्य देशों में सर्वत्र समान
रूप से श्रद्धा एवं सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। दुनिया में हिंदू धर्म और
भारत की प्रतिष्ठा स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद एक आध्यात्मिक हस्ती होने के
बावजूद अपने नवीन एवं जीवंत विचारों के कारण आज भी युवाओं के प्रेरणास्रोत बने हुए
हैं। विवेकानंद जन्म 12 जनवरी 1863
ई.,
सोमवार के दिन प्रात:काल सूर्योदय के किंचित् काल बाद 6
बजकर 49
मिनट पर हुआ था।
मकर संक्रांति का वह दिन हिन्दू जाति के लिए महान उत्सव का अवसर था और भक्तगण उस
दिन लाखों की संख्या में गंगाजी को पूजा अर्पण करने जा रहे थे। अत: जिस समय भावी
विवेकानंद ने इस धरती पर पहली बार साँस ली,
उस समय उनके घर के समीप ही प्रवाहमान पुण्यतोया भागीरथी लाखों नर-नारियों की
प्रार्थना,
पूजन एवं भजन के कलरव से प्रतिध्वनित हो रही थीं। स्वामी विवेकानंद के जन्म के
पूर्व अन्य धर्मप्राण हिन्दू माताओं के समान ही
उनकी
माताजी ने भी व्रत-उपवास किए थे तथा एक ऐसी संतान के लिए प्रार्थना की थी
जिससे उनका कुल धन्य हो जाए। उन दिनों उनके मन-प्राण पर त्यागीश्वर शिव ही अधिकार
जमाए हुए थे,
अत: उन्होंने वाराणसी में रहने वाली अपने रिश्ते की एक महिला से वहाँ के वीरेश्वर
शिव के मंदिर में विशेष पूजा चढ़ाका आशीर्वाद माँगने का अनुरोध किया था। एक रात
उन्होंने स्वप्न में महादेव जी को ध्यान करते देखा,
फिर उन्होंने नेत्र खोले और उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वचन दिया। नींद
खुलने के बाद उनके आनंद की सीमा न रही थी। माता भुवनेश्वरी देवी ने अपने पुत्र को
शिवजी का प्रसाद माना और उसे वीरेश्वर नाम दिया। परंतु परिवार में उनका नाम नरेंद्र
नाथ दत्त था और संक्षेप में उन्हें नरेंद्र तथा दुलार में नरेन कहकर संबोधित किया
जाता था। कलकत्ते के जिस दत्त वंश में नरेंद्र नाथ का जन्म हुआ था,
वह अपनी समृद्धि,
सहृदयता,
पांडित्य एवं स्वाधीन मनोवृत्ति के लिए सुविख्यात था। उनके दादा श्री दुर्गाचरण ने
अपने प्रथम पुत्र का मुख देखने के बाद ही ईश्वर प्राप्ति की अभिलाषा से गृह त्याग
कर दिया था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता थे।
उन्होंने अँगरेजी तथा फारसी साहित्य का गहन अध्ययन किया था।
उनकी माता भुवनेश्वरी देवी एक अलग ही साँचे में ढली थीं। वे देखने में गंभीर और
आचरण में उदार थीं तथा प्राचीन हिन्दू परंपरा का प्रतिनिधित्व करती थीं। वे एक भरे
पूरे परिवार की मालकिन थीं और अपने अवकाश का समय सिलाई एवं भजन गाने में बिताती
थीं। रामायण एवं महाभारत में उनकी विशेष रुचि थी तथा इन ग्रंथों के अनेक अंश उन्हें
कंठस्थ भी थे। निर्धनों के लिए वे आश्रय थीं। अपनी ईश्वर भक्ति,
आंतरिक शांति तथा अपनी व्यस्तता के बीच तीव्र अनासक्ति के फलस्वरूप वे सबके सम्मान
की अधिकारिणी हुई थीं। नरेंद्रनाथ के अतिरिक्त उन्हें और भी दो पुत्र तथा चार
पुत्रियाँ हुईं,
परंतु उनमें से दो पुत्रियाँ अल्प आयु में ही चल बसी थीं।
नरेंद्र का उसके संसार त्यागकर संन्यासी हो जाने वाले पितामह से काफी साम्य दिख
पड़ता था और इस कारण कइयों का विचार था कि उन्होंने ही नरेन के रूप में पुनर्जन्म
लिया है। भ्रमण करने वाले संन्यासियों में बालक की बड़ी रुचि थी और उन्हें देखते ही
वह उत्साहित हो उठता।
एक दिन एक ऐसे परिव्राजक संन्यासी उसके द्वार पर आकर भिक्षा माँगने लगे। नरेंद्र ने
उनको अपनी एकमात्र वस्तु-कमर से लिपटा हुआ एक छोटा से नया वस्त्र दे दिया। तब से जब
कभी आस-पड़ोस में कोई संन्यासी दिख जाते तो नरेंद्र को एक कमरे में बंद कर दिया
जाता। तथापि जो कुछ भी हाथ में आता,
वह खिड़की के रास्ते उनकी ओर डाल देता। इन्हीं दिनों माँ के हाथों में उसकी
प्रारंभिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इस प्रकार उसने बंगला की वर्णमाला,
कुछ अँगरेजी शब्द तथा रामायण एवं महाभारत की कथाएँ सीखीं।
सन् 1886
में
रामकृष्ण के निधन के बाद स्वामी विवेकानंद ने जीवन एवं कार्यों को एक नया मोड़
दिया। 25
वर्ष
की अवस्था में उन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही
पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। गरीब,
निर्धन और सामाजिक बुराई से ग्रस्त देश के
हालात देखकर दुःख और दुविधा में रहे। उसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि शिकागो में
1893 में विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। उन्होंने वहाँ जाने का निश्चय
किया। वहाँ से आने के बाद देश में प्रमुख विचारक के रूप में उन्हें सम्मान और
प्रतिष्ठा मिली। 1899
में
उन्होंने पुन: पश्चिम जगत की यात्रा करने के बाद भारत में आध्यात्मिकता का संदेश
फैलाया। स्वामी विवेकानंद नर सेवा को ही नारायण सेवा मानते थे। उनका मानना था कि
“जो
महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं,
वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं,
जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत्
की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–
अंत में उनकी शक्ति के फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है,
जो संसार को शिक्षा प्रदान करता है।”
अब से करीब 120 वर्ष पहले 11
सितंबर,
1893
को
स्वामी विवेकानंद ने शिकागो
‘पार्लियामेंट
आफ रिलीजन’
में भाषण दिया था,
उसे आज भी दुनिया भुला नहीं पाती। इस भाषण से दुनिया के तमाम पंथ आज भी सबक ले सकते
हैं। इस अकेली घटना ने पश्चिम में भारत की एक ऐसी छवि बना दी,
जो आजादी से पहले और इसके बाद सैकड़ों राजदूत मिलकर भी नहीं बना सके। स्वामी
विवेकाननंद के इस भाषण के बाद भारत को एक अनोखी संस्कृति के देश के रूप में देखा
जाने लगा। अमेरिकी प्रेस ने विवेकानंद को उस धर्म संसद की महानतम विभूति बताया था।
और स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था,
उन्हें सुनने के बाद हमें महसूस हो रहा है कि भारत जैसे एक प्रबुद्ध राष्ट्र में
मिशनरियों को भेजकर हम कितनी बड़ी मूर्खता कर रहे थे। यह ऐसे समय हुआ,
जब ब्रिटिश शासकों और ईसाई मिशनरियों का एक वर्ग भारत की अवमानना और पाश्चात्य
संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने में लगा हुआ था। उदाहरण के लिए 19वीं सदी के अंत
में अधिकारी से मिशनरी बने रिचर्ड टेंपल ने मिशनरी सोसायटी इन न्यूयार्क को संबोधित
करते हुए कहा था- भारत एक ऐसा मजबूत दुर्ग है,
जिसे ढहाने के लिए भारी गोलाबारी की जा रही है। हम झटकों पर झटके दे रहे हैं,
धमाके पर धमाके कर रहे हैं और इन सबका परिणाम उल्लेखनीय नहीं है,
लेकिन आखिरकार यह मजबूत इमारत भरभराकर गिरेगी ही। हमें पूरी उम्मीद है कि किसी दिन
भारत का असभ्य पंथ सही राह पर आ जाएगा। जब शिकागो धर्म संसद के पहले दिन अंत में
विवेकानंद संबोधन के लिए खड़े हुए और उन्होंने कहा- अमेरिका के भाइयो और बहनो,
तो तालियों की जबरदस्त गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत हुआ,
लेकिन इसके बाद उन्होंने हिंदू धर्म की जो सारगर्भित विवेचना की,
वह कल्पनातीत थी। उन्होंने यह कहकर सभी श्रोताओं के अंतर्मन को छू लिया कि हिंदू
तमाम पंथों को सर्वशक्तिमान की खोज के प्रयास के रूप में देखते हैं। वे जन्म या
साहचर्य की दशा से निर्धारित होते हैं,
प्रत्येक प्रगति के एक चरण को चिह्नित करते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने तब जबरदस्त प्रतिबद्धता का परिचय दिया,
जब एक अन्य अवसर पर उन्होंने ईसाई श्रोताओं के सामने कहा- तमाम डींगों और शेखी
बखारने के बावजूद तलवार के बिना ईसाईयत कहां कामयाब हुई?
जो ईसा मसीह की बातें किया करते हैं, वे अमीरों के अलावा और किसकी परवाह करते हैं!
ईसा को एक भी ऐसा पत्थर नहीं मिलेगा,
जिस पर सिर रखकर वह आप लोगों के बीच स्थान तलाश सके..आप ईसाई नहीं हैं। आप लोग फिर
से ईसा के पास चले जाएं। एक अन्य अवसर पर उन्होंने यह मुद्दा उठाया- आप ईसाई लोग
गैरईसाइयों की आत्मा की मुक्ति के लिए मिशनरियों को भेजते हैं। साफगोई और बेबाकी
विवेकानंद का सहज गुण था।
देश
में वह हिंदुओं से अधिक घुलते-मिलते नहीं थे। जब उनके आश्रम में एक अनुयायी ने उनसे
पूछा कि व्यावहारिक सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना का उनका प्रस्ताव
संन्यासी परंपरा का निर्वहन कैसे कर पाएगा?
तो उन्होंने जवाब दिया- आपकी भक्ति और मुक्ति की कौन परवाह करता है?
धार्मिक
ग्रंथों में लिखे की किसे चिंता है?
अगर
मैं अपने देशवासियों को उनके पैरों पर खड़ा कर सका और उन्हें कर्मयोग के लिए
प्रेरित कर सका, तो मैं फिर हजार नर्क भी भोगने के लिए तैयार हूं। मैं मात्र
रामकृष्ण परमहंस या किसी अन्य का अनुयायी नहीं हूं। मैं तो उनका अनुयायी हूं,
जो भक्ति और मुक्ति की परवाह किए बिना अनवरत दूसरों की सेवा और सहायता में जुटे
रहते हैं। विवेकानंद की साफगोई के बावजूद जिसने उन्हें अमेरिकियों के एक वर्ग का
चहेता नहीं बनने दिया,
उन्हें हिंदुत्व के विभिन्न पहलुओं की विवेचना के लिए बाद में भी अमेरिका से न्यौते
मिलते रहे। जहां-जहां वह गए उन्होंने बड़ी बेबाकी और गहराई से अपने विचार पेश किए।
उन्होंने भारत के मूल दर्शन को विज्ञान और अध्यात्म,
तर्क और आस्था के तत्वों की कसौटी पर कसते हुए आधुनिकता के साथ इनका सामंजस्य
स्थापित किया। उनका वेदांत पर भी काफी जोर रहा।
विवेकानंद ने यह स्पष्ट किया कि अगर वेदांत को जीवन दर्शन के रूप में न मानकर एक
धर्म के रूप में स्वीकार किया जाता है,
तो यह सार्वभौमिक धर्म है- समग्र मानवता का धर्म। इसे हिंदुत्व के साथ इसलिए जोड़ा
जाता है,
क्योंकि
प्राचीन भारत के हिंदुओं ने इस अवधारणा की संकल्पना की और इसे एक सुसंगत विचार के
रूप में पेश किया। एक अलग परिप्रेक्ष्य में श्री अरबिंदो ने भी यही भाव प्रस्तुत
किया- भारत को अपने भीतर से समूचे विश्व के लिए भविष्य के पंथ का निर्माण करना है।
एक शाश्वत पंथ जिसमें तमाम पंथों,
विज्ञान, और
दर्शन
आदि का समावेश होगा और जो मानवता को एक आत्मा में बांधने का काम करेगा। स्पष्ट तौर
पर मात्र एक भाषण ने ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित की,
जिसने पाश्चात्य मानस के अंतर्मन को प्रकाश से आलोकित कर दिया और ऊष्मा से भर दिया।
(पूर्व प्रशासनिक अधिकारी)