सदाबहार अभिनेता अशोक कुमार

जन्म 13 अक्तूबर और मृत्यु 11 दिंसबर

(प्रभात कुमार राय)

अत्यंत विस्मयकारी तौर अशोक कुमार सात दशक तक फिल्म अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय रहे। अशोक कुमार हिंदी फिल्मों की एक ऐसी अजी़म तरीन शख़्सियत का नाम रहा, जोकि तकरीबन आधी सदी तक रुपहले पर्दे पर छाई रही। अशोक कुमार अपने ही किस्म का एक ऐसा विरल फिल्म अभिनेता था, जोकि एक शानदार इंसान भी था। भव्यता, विराटता और सघनता उसके अनुपम व्यक्तित्व में एक साथ समाहित रही। तकरीबन 300 फिल्मों को अपने किरदार से सजाने वाला अशोक कुमार सजग, आत्मस्थ और अत्यंत संवेदनशील इंसान था। अशोक कुमार ने मोती लाल, बलराज साहनी और भारत भूषण के साथ मिलकर हिंदी सिनेमा की प्रकृत अभिनय की बृहत धारा का निर्माण किया।

सारी दुनिया के फिल्म समीक्षकों ने अशोक कुमार को असाधारण कालजयी अभिनेता की श्रेणी में शुमार किया है। उनकी तुलना हालीवुड के रिचर्ड बर्टन, उमर शरीफ पीटर सैलर्स, सरराल्फ रचर्डसन और अलेक गुइनेस जैसे अभिनेताओं के साथ की गई है। कुछ उल्लेखनीय फिल्मों में अशोक कुमार ने उदाहरण के लिए उस्ताद, कंगन, बंदिश, समाधि,  धर्मपुत्र,  कानून,  बंदनी,  परिणिता,  चित्रलेखा,  मेरी सूरत तेरी आंखे,  गुमराह, आर्शीवाद, आदि में बेमिसाल अदाकारी की। ज्वेल थीफ भी अशोक कुमार की एक ऐसी फिल्म रही, जिसमें कि उनकी विलेन की भूमिका को बहुत सराहना मिली। फिल्मों में टाइप्ड हो जाने से गुरेज़ करना अशोक कुमार के अपनी अभिनय समझ की सबसे बड़ी कामयाबी रही। हर फिल्म चरित्र में पूरी से समा कर उसे अभिनीत करने जो अद्भुत क्षमता अशोक कुमार के पास रही, उसकी तुलना केवल बलराज साहनी के साथ की जा सकती है।

अशोक कुमार के विषय में अकसर कहा गया कि वह स्वाभाविक अभिनय के धनी रहे। किंतु यह कहना अधिक उचित होगा कि वह स्वाभाविकता की हदों से भी कहीं आग निकल जाते थे। फिल्म के किरदार के साथ एकदम ही एकाकार हो जाया करते थे। अपनी शख़्सियत से पूरी तरह विलग होकर उसी पात्रा में समा जाते थे, जिसको कि वह निभा रहे होते थे। अशोक कुमार के बाद हिंदी फिल्मों में पदापर्ण करने वाले अभिनेताओं में केवल एक संजीव कुमार ही हैं, जिनकी तुलना किसी हद तक अशोक कुमार के साथ की जा सकती है। हांलाकि दुर्भाग्य से संजीव कुमार ने केवल 45 सालों का जीवन ही पाया, किंतु अपने सहज सजीव स्वाभाविक अभिनय के लिए उनको अशोक कुमार के साथ याद किया जाता रहेगा।

अशोक कुमार अपनी कामयाबी के लिए अपनी पत्नी शोभा को बहुत श्रेय दिया करते थे। अशोक कुमार की शादी पारिवारिक पंसद से हुई थी। उनकी पत्नी फिल्मी ग्लैमर से बहुत दूर रही। यह बात आज के दौर में कुछ अजब प्रतीत हो सकती है, किंतु घर गृहस्थ की तमाम चिंताओं से मुक्त होकर यदि अभिनय की दुनिया स्वयं को अशोक कुमार पूरी तरह से समर्पित कर सके तो इसका पूरा श्रेय उनकी घरेलू स्वभाव की पत्नी को प्रदान किया जाना चाहिए। अशोक कुमार की व्यस्तता इस कदर रही कि वह अपने बच्चों के लालन पालन शिक्षा दीक्षा तक पर तव्वजो नहीं दे सके। यह सब जिम्मेदारी उनकी पत्नी शोभा की ही रही। एक बंगाली बाबू की शालीनता और ब्राह्मण की शुचिता का उन पर सदैव असर कायम रहा ।  

फिल्म वाले प्यार से अशोक कुमार को दादामुनि कहा करते थे। दरअसल बंगाल में बडे़ भाई के लिए दादा शब्द का प्रयोग किया जाता है। मुनि इसके साथ कैसे जुड़ गया यह एक रहस्य ही रहा। शायद फिल्मों की तड़क भड़क वाली ग्लैमरस दुनिया में भी अशोक कुमार जैसे आडंबरविहीन और किसी भी तरह के अंहकार से दूर लिए सीधे साधे सरल स्वभाव के शख़्स के लिए मुनि शब्द को प्रयोग किया जाने लगा। वह जरा सा भी खाली समय मिलते ही वह अभिनय कला और हाम्योपैथी की किताबों में खोये रहते थे। साथ ही इस ज्ञान का व्यवहारिक प्रयोग करने के लिए भी सदैव तत्पर रहते थे।

अशोक कुमार वस्तुतः अभिनय के जिस प्रकृत अभिनय स्कूल से संबद्ध रहे उस प्रकृत अभिनय स्कूल की विशिष्टता यह रही है कि यह यर्थाथवादी सूक्ष्मता से सराबोर होता है और साथ ही किसी तरह की बनावटी उत्तेजना से भी बहुत दूर होता है। इस अभिनय शैली का अभिनेता वस्तुतः अभिनय नहीं करता वरन उस किरदार को पर्दे पर जिया करता है जैसा कि कोई असल जिंदगी में जीया करता है। प्रकृत अभिनय की शैली दरअसल एक अद्वितीय उद्घाटन रही, जबकि आमतौर पर इस देश की अभिनय प्रतिभाएं उस क्षितिज से उभर कर आती रही, जिसमें अतिरंजना से भरपूर मैलोड्रामा का पुट बरक़रार रहता है। कुछ ही यथार्थवादी अभिनेताओं ने इस अपनी अद्वितीय अभिनय क्षमता के बूते पर अतिनाटकीय और अतिरंजित अभिनय से विलग होकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। इन अभिनेताओं में अशोक कुमार ने एक लंबी पारी खेली और अभिनय के वैविध्य को अनुपम विस्तार दिया। अशोक कुमार के रुप में हिंदी सिनेमा को एक संपूर्ण और समर्थ कलाकार प्राप्त हुआ था।

अशोक कुमार का जन्म 13 अक्तूबर 1911 को हुआ था। मध्य प्रदेश के शहर खंडवा में उनके पिता कुंजीलाल गांगुली एक कामयाब वकील थे। उसके बचपन का नाम कुमुद लाल था जोकि प्रख्यात निर्माता निर्देशक हिमांशु रॉय के द्वारा फिल्म जीवन नैया में बदल कर अशोक कुमार कर दिया गया। खंडवा के परिवेश में कुमुद लाल के जिस व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था उसका परिष्कार मुंबई नगरी में अशोक कुमार के रुप में पूरा हुआ। अशोक कुमार जब फिल्मों की दुनिया में दाखिल हुए तो वह सुशिक्षित, शालीन और खूबसूरत नौजवान थे। फिल्म दीदार में उनका रूमाल निकालने का तरीका, मुंह पोछने का अंदाज, चाय में शक्कर मिलाने का सलीका आदि सभी कुछ कुलीनता और अभिजात्यता से उभर कर आता हुआ प्रतीत होता है ।  

अशोक कुमार ने जबलपुर के राबर्टसन कालेज से बीएससी करने के पश्चात कोलकता विश्वविद्यालय से कानून की पढाई शुरू की। परीक्षा से पहले लंबे अवकाश काल में प्रख्यात निर्देशक हिमांशु राय से फिल्म तकनीक का प्रशिक्षण लेने के लिए अशोक कुमार बंबई आए थे। हिमांशु रॉय उन दिनों फिल्म जीवन नैया का निर्देशन कर रहे थे। हिमांशु रॅाय की पारखी नजरों ने अशोक कुमार के व्यक्तित्व में एक छिपे हुए अभिनेता के दीदार कर लिए। अनुभवी हिमांशु रॉय का आकलन अशोक कुमार के विषय में एकदम सही साबित हुआ। अशोक कुमार ने बहुत ही जल्द फिल्म अभिनय के क्षेत्र में अपने कदम बखूबी जमा लिए। मंझोला कसा हुआ बदन, चैड़ा माथा, मजबूत जबड़े पनियल आंखें, घुंघराले काले बाल, संवाद अदायगी का सहज सरल अंदाज और मुस्कुराती विराटता इन सब ने मिल कर एक कालजयी अभिनेता को निर्मित किया।

अशोक कुमार के व्यक्तित्व में एक अजब किस्म की बेतकल्लुफी और गजब की सादगी सदैव ही विद्यमान रही। उनकी आवाज में एक समझदार और सुलझे हुए इंसान की छवि दिखाई देती थी, जिसमें कतई तौर पर ओछापन और बनावट शामिल नहीं थी। शुरूआत में देविका रानी के साथ फिल्म का नायक एक शर्मिला सा नौजवान प्रतीत होता था, जोकि कुछ वक़्त के बाद ही नलिनी जयवंत और नरगिस का नायक बेबाक और बेधड़क होता चला गया। उसका अभिनय निखरता गया संवरता गया। एक तरफ जहां उसकी छवि गहन निराशा और वेदना को अभिव्यक्त करने वाले अभिनेता की रही, वहीं दूसरी ओर उसके चहरे की तरोताजा मुस्कुराहट में अशोक की दीप्ति झिलमिलाती रही। अशोक कुमार की अभिनय क्षमता में कोरी निपट भावुकता के स्थान पर सकारात्मक नैतिक चिंतन का भाव समाया रहा। यही कारण रहा कि अशोक कुमार ने फिल्म के रूपहले पर्दे पर डाक्टर ,वकील,  इंजीनियर, पुलिस डिटेक्टिव जैसे किरदारों का बखूबी जिया।

हिंदी फिल्म अभिनेताओं में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और चपल चतुर व्यक्तित्व का कोई अभिनेता रहा तो वह निसंदेह अशोक कुमार ही है। अशोक कुमार के अभिनय में आलस्यपूर्ण ठंडापन नहीं रहा और अनावश्यक उत्तेजना के स्थान पर प्रखर संवेदनशीलता विद्यमान रही। एक जन्मजात वकील के पास जिस प्रवाहमय भाषा में सूक्ष्म सवाल जवाब की प्रतुल प्रतिभा, शब्दों पर कुछ जोर देकर अपना मंतव्य कहने का विरल अंदाज और एक बाज जैसी तेज झपट, सभी कुछ अशोक कुमार के व्यक्तित्व में समाहित रहा। वह जिंदगी से कभी थके नहीं  और कभी उदास नहीं हुए। एक कर्मयोगी की तरह अपने काम में जिंदगी के आखिरी लम्हे तक जुटे रहे।

आखिरकार वह क्या रहस्य है कि अशोक कुमार ने फिल्मों में सात दशकों तक इतनी लंबी पारी खेली और उन्हे इतना अधिक पसंद किया गया ? तकरीबन तीन सौ फिल्मों की रिकार्ड संख्या में बेहद कामयाबी के साथ अभिनय किया। शायद उसकी अपार सफलता का रहस्य रहा कि अशोक कुमार के अभिनय में अत्यंत सहजता सदैव ही समाई रही। एक हंसमुख जिंदा दिल इंसान की ऐसी इमेज पेश की कि यदि जीवन एक उलझी हुई पहेली है तो उसको हल करने के बहुत से तरीके हैं, केवल अत्यंत गंभीर बने रह कर और उदास मनहूस चेहरा बनाकर ही उसे आप हल नहीं कर सकते। जीवंत अभिनय की खातिर पहाड़ बनने की नहीं वरन समंदर बनने की दरकार है। जल की सी तरलता और स्वाभाविक लचीलापन उसे बहुत से नए आयाम प्रदान कर सकता है। प्रख्यात वैज्ञानिक एडीसन ने कहा था कि कामयाबी के लिए मात्रा दस फीसदी प्ररेणा किंतु नब्बे फीसदी मेहनत की आवश्यकता हुआ करती है। संभवतया अशोक कुमार की कामयाबी के पीछे भी बस एडीसन का यही मंत्र रहा है।

प्रखर प्रतिभा और कड़े परिश्रम का अद्भुत संगम रहा था, अशोक कुमार संपूर्ण व्यक्तित्व। अशोक कुमार की पहली फिल्म अछूत कन्या को एक क्लासिकल हिंदी फिल्म करार दिया गया। इसमे अशोक कुमार एक सहमे हुए, सकुचाते हुए, झेंपते और शरमाते हुए से प्रतीत होते हैं। किंतु फिल्म किस्मत में वह आत्मविश्वास से लबरेज और लयात्मकता से ओतप्रोत दिखाई देते हैं। अशोक कुमार का लजीलापन अलविदा हो चुका था। फिल्म किस्मत ने रिकार्ड सफलता प्राप्त की। कोलकता के एक सिनेमागृह में यह फिल्म पांच सालों तक निरंतर ही चलती रही। हिंदी फिल्मों के इतिहास में किस्मत पहली सबसे बड़ी हिट रही। सन् 1950 का दशक अशोक कुमार के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि इस दशक में उनका मुकाबला दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर जैसे दिग्गज अभिनेताओं के साथ रहा। किसी भी तरह से अशोक कुमार इन सभी अभिनेताओं से कमतर साबित नहीं हुए। दीदार फिल्म का ही उदाहरण ले जिसमें कि अशोक कुमार और दिलीप कुमार ने एक साथ अभिनय किया था।

दिलीप कुमार ने जहां आरोह अवरोह के चिरपरिचित मैनैरिज्म के साथ अपनी अदायगी पेश की, वहीं अशोक कुमार ने अत्यंत सधे हुए ढंग से बिना किसी अतिरेक के अपनी भूमिका का निर्वाह किया। अशोक कुमार ने संजीदा गंभीर भूमिकाओं के साथ ही साथ हास्य अभिनय का भी बहुत सशक्त प्रदर्शन किया। फिल्म चलती का नाम गाड़ी और विक्टोरिया नंबर 203’ और शौकीन उनके सफल हास्य अभिनय का सबसे जीवंत उदाहरण रही। पूरे नब्बे सालों तक अत्यंत सक्रिय तौर पर अशोक कुमार जीवित रहे। 11 दिसंबर सन् 2001 को इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। अशोक कुमार अपने सहज प्रकृत और जीवंत अभिनय के लिए युगों तक याद किए जाएगें।

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